दो हत्या करने वाले मुजरिम का दोष दोनों मामलों में सिद्ध होने के बावजूद यह जरूरी नहीं है कि उसे फांसी की सजा दी जाए। यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक से एक महिला की हत्या करने वाले मुजरिम के मृत्यु दंड को उम्र कैद में बदलते हुए की। जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एल. नागेश्वर राव और जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की तीन सदस्यीय पीठ ने मुजरिम योगेंद्र की सजा बदलते हुए कहा कि फांसी की सजा उसी मामले में मुनासिब है, जहां दोनों अपराध में मुजरिम ने एक जैसे तरीके से बर्बरता दिखाई हो।
बता दें कि योगेंद्र ने दूसरे अपराध को तब अंजाम दिया था, जब वह हत्या के पहले मामले में 19 साल जेल में काटने के बाद जमानत पर बाहर आया था। पीठ ने योगेंद्र की सजा घटाते हुए यह माना कि हत्या के एक मामले में जमानत पर रहने के दौरान दूसरी हत्या करने को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन साथ ही कहा कि मौजूदा (योगेंद्र के) मामले में दोनों हत्याओं में मुजरिम का अपराध करने का तरीका एकसमान नहीं था।
पीठ ने कहा कि पहले मामले और दूसरे मामले की परिस्थिति और कारण अलग-अलग हैं। पीठ ने कहा कि पहले मामले में योगेंद्र ने एक अन्य के साथ मिलकर हत्या की थी, जबकि मौजूदा (दूसरा) मामले में मुजरिम ने ठुकराए आशिक के तौर पर शादीशुदा महिला पर एसिड से हमला किया था। इस मामले में बाद में महिला की मौत हो गई थी।
विशेष कारण होने पर ही मिले फांसी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फांसी की सजा के लिए सामान्य नहीं कोई विशेष कारण होना चाहिए। योगेंद्र के मामले में दूसरे अपराध की परिस्थितियों देखने पर लगता है कि मुजरिम का इरादा हत्या करने का नहीं था। पीठ ने कहा कि मौजूदा मामले में संभव है कि वह महिला को जख्मी करने का इरादा लेकर आया था न कि हत्या करने के इरादे से।
क्या था पूरा मामला
1994 में मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में मुजरिम योगेंद्र ने एक साथी के साथ मिलकर हत्या की एक वारदात को अंजाम दिया था। उस मामले में जमानत पर रहने के दौरान वर्ष 2014 में योगेंद्र ने शादीशुदा महिला रुबी पर एसिड से हमला किया था। एसिड अटैक में महिला के अलावा घर के तीन अन्य सदस्य भी जख्मी हुए थे। बाद में रूबी की मौत हो गई। योगेंद्र को पहले मामले में दोष सिद्ध होने पर उम्रकैद की सजा मिली थी। दूसरे मामले में निचली अदालत और फिर हाईकोर्ट ने योगेंद्र को फांसी की सजा दी थी। इसफैसले को योगेंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां उसकी सजा को फांसी से घटाकर उम्रकैद कर दिया गया।