मीठी ठंडाई के नुस्खे में भी काली मिर्च का अहम स्थान है। कुछ लोगों की निगाह में लखनऊ का ‘जॉजी सोहन हलवा’ या हैदराबाद का ‘हब्शी हलवा’ अनोखे हैं, पर इनमें पहला गेहूं के निशास्ते से बनने वाले ‘सिंधी हलवे’ का ही सहोदर है, जिसे ‘कराची हलवा’ या ‘मुंबई हलवे’ के नाम से भी जाना जाता है। और दूसरा हैदराबाद से कहीं बेहतर तरीके से दिल्ली में खाने को मिलता है।
हैदराबाद में इसका काला रंग और मिठास खजूर की देन है, तो दिल्ली में इसकी तासीर लौंग और दूसरे मसालों के मिश्रण से गर्म हो जाती है। ऐसा माना जाता है कि यह हलवा कई सदी पहले दक्षिण में अबिसीनियाई गुलामों और भाड़े के सैनिकों के साथ पहुंचा था। दक्षिण भारत में ‘बादाम के हलवे’ को नायाब समझा जाता है, तो शायद इसलिए कि उन्होंने ‘अखरोट का हलवा’ नहीं चखा, जो सूरत के मिठाई बनाने वाले बड़े नाज से बनाकर अपने ग्राहकों को रिझाते हैं। कश्मीर में जो ‘सेब का हलवा’ होता है, वह भी कम नहीं। कश्मीर के वाजा अपने हुनर की नुमाइश इसी को बनाकर और खिलाकर करते हैं।
आप यदि अपनी कल्पना शक्ति को खुला छोड़ दें, तो शायद ही कोई ऐसी चीज हो, जिससे स्वादिष्ट और पौष्टिक हलवा तैयार न किया जा सकता हो। राजा साहब सेलाना में एक शाही दावत में अपने दादाजी के नुस्खे से हरे चने का जो लजीज हलवा बनाया था, वह पिस्ते की लौंज को मात देने वाला था। अक्सर लागत घटाने को हलवाई पिस्ते में हरे चने या छोलिये की मिलावट करते हैं, लस्सी में मलाई का भ्रम पैदा करने के लिए सोखते कागज की परत की तरह। खसखस पोस्ते या अफीम के बीज का हलवा भी आजकल कभी-कभार ही देखने को मिलता है।