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अमर उजाला शब्द सम्मान: हम समय के उस्तादों से घिरे हैं... अंधेरों में टटोल-टटोल के बढ़ना है

Mon, 30 Dec 2019 05:43 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

अमर उजाला शब्द सम्मान 2019 में आकाशदीप अलंकरण से सम्मानित किए गए वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन कहते हैं कि मेरा काम ही ऐसा है, जिस तरह पर्वत शृंखलाओं को पार करने, नदियों की छाती पर पुल बनाने, जंगलों-बीहड़ों से गुजरते जाने और रेतीले तपिश भरे अनुभवों में जाने -लौटने का होता है।
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वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दुनियाभर में उच्चतर सम्मानों में दिए गए सदा जीवित जगमगाते व्याख्यानों को हम बार-बार पढ़ते हैं; प्रकाशित करते रहे हैं। प्राय: सम्मानित होने पर विनम्रताएं या गर्वोक्तियां प्रकट होती हैं। यहां मेरा व्यक्तव्य बहुत सीमित-संक्षिप्त, आत्मपरक और रिवाजों से हटकर है, जिसके लिए पहले ही क्षमा मांगता हूं।

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जीवन के अंतिम उत्तरार्द्ध में आकाशदीप पाकर मैं बहुत खुश और संतुष्ट हूं। खासतौर पर जबकि मैंने दिया कम है और मुझे मिला अधिक है। पर यह जरूरी भी है कि मेरी आत्मा में जो हलचल है, उससे आपको परिचित करा दूं। अगर मेरा देश इस दौर में सेहतमंद और संपन्न होता तो इस पुरस्कार की खुशी मुझे सौ गुना होती। जी हां, मुझे ऊर्जा और विजय पसंद है, पर मैं जो हासिल करता हूं, उससे जल्दी ही उदास हो जाता हूं। मुझे पहचान-हीनता और आत्म-निषेध भी पसंद है, लेकिन जिजीविषा मुझे अपनी तरफ खींचती है। इसका कारण हमारा देश है।

मैं एक छोटे शहर में तनहाई में लगभग अज्ञात शैली से अपना काम करता हूं। खास बात यह है कि मेरे इस शहर ने चौकन्ना और धुरंधर होने से इनकार कर दिया है। बावजूद इसके, मुझे बार-बार खोज लिया जाता है। शायद मौलिकता और मेरी बेचैनियों की वजह से। मेरा काम ही ऐसा है, जिस तरह पर्वत शृंखलाओं को पार करने, नदियों की छाती पर पुल बनाने, जंगलों-बीहड़ों से गुजरते जाने और रेतीले तपिश भरे अनुभवों में जाने -लौटने का होता है। एनकाउंटर, पेरिस रिव्यू, पार्टिजन रिव्यू, पोयट्री, लंदन मैगजीन जैसी पत्रिकाएं निकालने वाले कल्पनाशील लोग अंतत: तबाह हो गए। मेरा रास्ता, जिसे मैंने चुना, वह भी तबाही का रहा। सांसारिक सफलताओं का नहीं।
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जब मैं युवा था, कहानियां लिखता था। मेरे साथ जोशीले, कलंदर, मुहब्बतों से भरे हुए जिंदादिल लोगों की दुनिया थी। वह सोहबतों का एक बहुत ही खूबसूरत वृंदावन था। बड़ी बेकरारी थी। रचनाएं जुगनुओं की तरह दमकती थीं। जब जीवन के मध्यकाल में अपनी संपादकीय दुनिया गहरी जीत के साथ शुरू की तो अपने लेखक को ईंधन की तरह उसमें झोंक दिया।

दुनिया के तमाम शानदार रिसालों का सपना देखते हुए मैंने ‘पहल’ शुरू की, जो 45 वर्षों से जारी है। बहरहाल, तब और अब का फर्क यह है कि आज हमारी दुनिया के होनहार, निराश, शोकमग्न और पराजित लोग हमारे बेसमेंट में काम कर रहे हैं। वे मुझमें एक प्रतीक्षा करते हैं, पर हमारे देश का वर्तमान अंधेरा और हिंसक है। हम समय के माहिर और समय के उस्तादों से घिर गए हैं। अब हमें अंधेरों में टटोल-टटोल के बढ़ना है। वाचालों की आवाजें गूंज रही हैं। हम पैदल हैं और हमारे हाथ में हमारे महान युग प्रवर्तक लेखक-कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की लालटेन है, जो रफ्तार, रक्तपात, विरुद्ध जनता और खूंखार शास्ता से हमें आगाह करती है।

हम रेत में चल रहे हैं, हमारे पैर चल रहे हैं, हम कहीं नहीं पहुंच रहे हैं। हम दल-दल में गगनचुंबी इमारतें बना रहे हैं। आततायी बर्बर बाहर से आते थे, अब वे घर से ही निकल रहे हैं। घर-बाहर का अंतर समाप्त है। इसको रचने के लिए आधुनिक भाषा असफल हो गई है, क्लासकीय और जनपदीय वाक्य कारगर गद्य नहीं बन पा रहे हैं।

बहरहाल, आज की शाम बहुत यादगार और अभूतपूर्व है। खुशी और रोमांच इस उम्र में भी मिल सकती है...अनुभव कर रहा हूं। आकाशदीप सभी गैर सरकारी सम्मानों से इतर और उच्चतर है कि वह हिंदी के साथ दूसरी भाषाओं को भी समान दर्जा देता है। वह जन्म लेते ही वयस्क हो गया है। इसने साहित्य की क्षेत्रीय और कूट धाराओं को तोड़ दिया है। इसमें लोकतंत्र की रोशनी है। जूरी भी विविध और पारदर्शी है, उसमें सर्वोत्तम रचनाकार आते-जाते हैं और उनका कोई चक्रव्यूह नहीं है, वे आजाद हैं। बस।

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आकाशदीप अलंकरण: वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन के वक्तव्य के संपादित अंश

मेरा काम ही ऐसा है, जिस तरह पर्वत शृंखलाओं को पार करने, नदियों की छाती पर पुल बनाने, जंगलों-बीहड़ों से गुजरते जाने और रेतीले तपिश भरे अनुभवों में जाने -लौटने का होता है।

आकाशदीप सम्मान सभी गैर सरकारी सम्मानों से इतर और उच्चतर है कि वह हिंदी के साथ दूसरी भाषाओं को भी समान दर्जा देता है। वह जन्म लेते ही वयस्क हो गया है। इसने साहित्य की क्षेत्रीय और कूट धाराओं को तोड़ दिया है। इसमें लोकतंत्र की रोशनी है।
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