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‘पद्म भूषण क्या, राष्ट्रपति बना देगी भाजपा’: भट्टाचार्य पर गोगोई का तंज; ज्ञानेश कुमार को लेकर कही ये बात

Sat, 26 Sep 2026 05:25 PM IST
राकेश कुमार एएनआई, नगांव।

सार

ज्ञानेश कुमार को लेकर ताजा राजनीतिक विवाद भाजपा सांसद सामिक भट्टाचार्य के पद्म भूषण वाले बयान के बाद और तेज हुआ है। इसकी पृष्ठभूमि चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया और आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई कथित 14 आपत्तियों से जुड़ी है। कांग्रेस इन घटनाओं को लेकर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और आंतरिक मतभेद सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा हैं। विवाद अब राजनीतिक आरोपों के साथ-साथ कानूनी स्तर पर भी पहुंच चुका है।
 
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चुनाव आयोग पर उठे सवाल - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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असम के नागांव में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर भाजपा सांसद सामिक भट्टाचार्य के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी। भट्टाचार्य ने कहा था कि ज्ञानेश कुमार कम से कम पद्म भूषण के हकदार हैं। इस पर गोगोई ने तंज कसते हुए कहा, 'पद्म भूषण? भाजपा उन्हें राष्ट्रपति बना देगी।' उन्होंने कहा कि आज भाजपा के सदस्य ज्ञानेश कुमार के समर्थन में खड़े हैं, जबकि चुनाव आयोग के भीतर के अधिकारियों ने भी उनके कामकाज पर सवाल उठाए हैं। इसके बाद उन्होंने चुनाव आयोग के कामकाज, मतदाता सूची और आयोग के भीतर अधिकारियों की आपत्तियों का मुद्दा उठाया। 
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गोगोई ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर क्या कहा?
कांग्रेस नेता ने कहा कि पहले चुनावों में बूथ कैप्चरिंग या मतपेटियां कब्जाने जैसी बातें सुनने को मिलती थीं। गोगोई ने आरोप लगाया कि अब भाजपा पूरी मतदाता सूची पर ही कब्जा करना चाहती है। गोगोई ने कहा कि कांग्रेस की मांग है कि ज्ञानेश कुमार अपने पद से इस्तीफा दें। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी चाहते हैं कि ज्ञानेश कुमार सरकारी गवाह बनकर पूरी बात सामने रखें। गौरव गोगोई ने यह भी कहा कि ज्ञानेश कुमार को खुले तौर पर बताना चाहिए कि कथित तौर पर उनसे कौन गैरकानूनी और असांविधानिक काम करवा रहा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि ऐसे निर्देश आखिर कौन दे रहा है। गोगोई के मुताबिक, इन कथित निर्देशों ने भारतीय चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और उसकी संस्थागत साख को नुकसान पहुंचाया है।

सामिक भट्टाचार्य ने क्या कहा था? 
बंगाल भाजपा अध्यक्ष ज्ञानेश कुमार को कम से कम पद्म भूषण दिया जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल के लोग खुश हैं कि इतने समय बाद चुनाव में डर या धमकी का माहौल नहीं था। हत्या की कोई घटना नहीं हुई और लोगों को वास्तव में वोट डालने दिया गया।
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आखिर ज्ञानेश कुमार को लेकर विवाद शुरू कहां से हुआ?
इस विवाद की पृष्ठभूमि चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर प्रक्रिया से जुड़ी है। यह मतदाता सूची की व्यापक समीक्षा की प्रक्रिया है। चुनाव आयोग ने इसे पहले बिहार में जून 2025 में शुरू किया था। बाद में  दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक इसका विस्तार हुआ। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं।

रिपोर्ट में जिन मुद्दों पर आपत्तियों का जिक्र है, उनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण, नाम हटाना और बहाल करना तथा मतदाता सूची से जुड़े डेटा का प्रबंधन शामिल है। एक प्रमुख मुद्दा फॉर्म-6 में बदलाव का भी है। यही फॉर्म नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, नए आवेदकों से यह पूछा जाने लगा कि उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में था या नहीं।

चुनाव आयोग के अंदर की आपत्तियों में क्या बात सामने आई?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई मौकों पर मतदाता सूची से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्ति दर्ज की। इनमें चुनावी डेटा और उससे जुड़े आईटी सिस्टम के नियंत्रण को लेकर भी सवाल शामिल थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों अधिकारियों ने चुनावी डेटा के प्रबंधन में बढ़ते केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई थी। लेकिन यहां एक अहम बात है। चुनाव आयोग ने इन मतभेदों को अंतिम फैसलों में असहमति के बराबर नहीं माना। आयोग का कहना है कि आंतरिक विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और एसआईआर से जुड़े अंतिम फैसले तीनों आयुक्तों की सहमति से लिए गए।

यह भी पढ़ें: एसआईआर विवाद के बीच चुनाव आयोग की बैठक: ज्ञानेश कुमार के साथ दोनों आयुक्त मौजूद; सफाई में क्या कहा?

नए 18 साल के वोटरों का मुद्दा इतना अहम क्यों है?
यही वह मुद्दा है जिसे गौरव गोगोई ने अपने बयान में जोर देकर उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग में ज्ञानेश कुमार के कार्यालय के भीतर भी एक तरह का ‘आईटी सेल’ काम कर रहा है और यही तय करेगा कि 18 साल की उम्र पूरी करने वाले नए मतदाता का नाम मतदाता सूची में शामिल होगा या नहीं। हालांकि, यह गोगोई का राजनीतिक आरोप है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि दिए गए बयान में नहीं है।

चुनाव आयोग के मुताबिक उसका लक्ष्य 18 साल से ऊपर के हर पात्र भारतीय नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल करना है। 12 सितंबर 2026 को ज्ञानेश कुमार ने भी कहा था कि 18 साल से ऊपर के सभी भारतीय नागरिकों के नाम मतदाता सूची में होने चाहिए। आयोग ने मतदाताओं को अपनी जानकारी जांचने और पंजीकरण के लिए ECINET और फॉर्म-6 का इस्तेमाल करने को कहा है।
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फिर कांग्रेस ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा क्यों मांग रही है?
रिपोर्टों में सामने आई चुनाव आयोग के भीतर की आपत्तियों और SIR से जुड़े विवाद के बाद कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग तेज की है। कांग्रेस का आरोप है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और डेटा के प्रबंधन से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। 26 सितंबर को कांग्रेस ने पहली बार वोट देने वाले युवाओं के लिए Form 6 में नई जानकारी मांगे जाने को लेकर भी सवाल उठाए।
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