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अमर उजाला शब्द सम्मान: अदब से लेकर सत्ता-समाज का हाल... गुलजार का अंदाज

Mon, 30 Dec 2019 05:03 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

अमर उजाला शब्द सम्मान के समारोह में गुलजार से पहले ज्ञानरंजन और भालचंद्र नेमाडे अपना वक्तव्य दे चुके थे। जब गुलजार बोलने के लिए खड़े हुए तो इन दोनों के शब्दों और इनसे अपने रूहानी और कामकाजी रिश्तों के बहुरंगी इतिहास को उन्होंने थोड़े शब्दों में खूबसूरती से साझा किया। दोनों साहित्यकारों से अपनी पहचान, अपनेपन और उनके रचनाकर्म के प्रति सम्मान को शब्दों से ज्यादा कहने के अंदाज में बताया गुलजार ने।
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अमर उजाला शब्द सम्मान - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सत्ता के लहजे और चलन पर गुलजार ने अपने ही खास अंदाज में अनेक चुटीली टिप्पणियां कीं। इसमें जहां एक ओर आज के निजाम पर चोट थी, वहीं सत्ता के स्थायी चरित्र पर भी कटाक्ष थे। वक्तव्य का पहला शब्द उन्होंने बोला—‘दोस्तों।’ और फिर कहा, ‘मैं मित्रों कहते कहते रुक गया।’ इसके बाद कहा ‘दिल्ली से हर आने वाले से डर लगता है। पता नहीं क्या करे...क्या कानून लेकर चले आए।’

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उन्होंने कहा, आज यहां उन लोगों के बीच हूं जिनके पास इजहार है, जिन्हें जिंदगी छूती है और जो जिंदगी की इस छुअन को बयां भी कर लेते हैं। उनके पास बैठकर सीखने का मौका भी मिलता है।

ज्ञानरंजन जी से पहली मुलाकात उनकी पहली पहल (पत्रिका) के समय की है। उस मैगजीन से उन्होंने मेरा तआर्रुफ कराया था, कुछ वक्त तक साथ-साथ चलता रहा, सीखता रहा। पता नहीं उन्होंने कहानी लिखना क्यों छोड़ दिया...बड़े कमाल की कहानी लिखते थे।
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पूरे मिडिल क्लास को एक गर्मी की शाम के बहाने कौन बयां कर सकता है...उसमें समाज का वो हिस्सा नजर आने लगता है जो उस गर्मी में जीते हैं। और वो गर्मी केवल मौसम की गर्मी नहीं... पूरे समाज की जद्दोजहद की है। उन्हीं ज्ञानरंजन को आपने सुना। सीधा बोलना, साफ बोलना-कहना उनकी विशेषता है। किसी को बुरा लगे तो लगे, लेकिन सच नहीं बदला जा सकता...उसे कैसे नरम किया जाए। सच को खस्ता तो नहीं बनाया जा सकता। ज्ञानरंजन जी की यही बड़ी खूबी है जो हम उनसे सीखते हैं और आपके उस इजहार को हम सलाम करते हैं।

अपने खास लहजे में उन्होंने ज्ञानरंजन से शिकायत भी की, ‘उन्होंने कहानी लिखना क्यों छोड़ दिया...तब जबकि वक्त की कहानी तो चल रही है, हिन्दुस्तान की कहानी चल रही है अभी। और अभी पक रही है... हर लम्हा छू रही है...हर शख्स को हर कौम को। हर आम आदमी को।

नेवाडे जी की कविताओं और उनसे जो मेरी मुलाकात हुई, काफी जद्दोजहद के बाद। तो उन्हें आज लाइफटाइम अचीवमैंट अवार्ड मिला और मैं जो उनसे मिल पाया वह मेरा अचीवमैंट रहा, लाइफटाइम का, अवार्ड (मुझे) मिला न मिला...। उनकी कविताएं लेकर आया...उनमें रवायत है। और जितना भी कहिए, आज भी, इन हालात में भी अगर कोई आवाज शुद्ध है, साफ बोलती है और सच कहती है, तो वो सिर्फ लेखक की जुबान है। उसकी आवाज एक परचम की तरह खड़ी है।’

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घोड़े खरीदो...घोड़ों का व्यापार करो

एक आम आदमी है मुरारीलाल, जो अक्सर अपने किस्से मुझे सुनाया करता है। मैं उससे आपको भी मिलवाना चाहता हूं। जो हो रहा है, उस हालात से हम गुजरे हैं, महाराष्ट्र में रहते हुए। दिक्कत यह है कि मुरारीलाल के माथे से बल नहीं जाते। वो हर बात पर चिंता में रहता है। तो मुरारीलाल कहता है कि-

हाथी मरे तो मरने दो प्यादों की मत फिक्र करो
फीला (शतरंज के खेल का ऊंट) हटा लो
घोड़े खरीदो घोड़े, घोड़ों का व्यापार करो
ढाई घर चलते हैं ये, दायें हों या बायें
वजीर बचा लो...
कैसी ये शतरंज चली है महाराष्ट्र में
मुरारीलाल के माथे से बल नहीं जाते।
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