जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ) बृहस्पतिवार को कवि व गीतकार गुलजार से गुलजार हो गया। गुलजार ने जिंदगी, साहित्य, सियासत, समाज जैसे कई पहलुओं को साधारण शब्दों में ऐसे छुआ कि लोग वाह-वाह कह उठे। उन्होंने कहा कि मैं ऊंची कुर्सी से घबराता हूं, क्योंकि उसमें पांव जमीन पर नहीं टिकते। पांव जमीन पर नहीं टिके, तो कलम स्याही का स्वाद चखना बंद कर देगी। घमंड और गुरूर आ जाएगा। उन्होंने कहा कि ऊंची कुर्सी पर बैठकर पांव जरूर मैले नहीं होंगे, लेकिन स्थित उस फूल की तरह हो जाएगी, जो टहनियों के जरिए जड़ों से नहीं जुड़ा होता। गुलजार ने चूल्हे, बरतन, भाप और ढक्कन से खुद के लेखन का फलसफा भी जाहिर किया। जब आग की ताप बरतन में भाप बनाती है, तो ढक्कन घड़घड़ाने लगता है। बस यही भाप की तीव्रता मेरी लिखाई है। मैं तब लिखता हूं जब मेरे अंदर कुछ उलबता है।
न पकती है, न गलती है, जिंदगी यूं ही चलती है
हांडिया इतनी, सभी में जिंदगी उबलती है, लेकिन न पकती है न गलती है ये जिंदगी यूं ही चलती है। गुलजार की सुनाई इन पक्तियों ने सभी का दिल जीत लिया। उन्होंने फिर कहा कि एक जमाना गुजरता था कल गली से, बड़ी रफ्तार में था, मैं जरा सा हट गया कि उसे रास्ता दे दूं, मैं खुद से कह रहा हूं कि जमाना चल रहा है तुम रुकोगे तो गिरोगे। उन्होने बताया कि वे समकालीन शायरों के काम पर एक किताब लेकर आ रहे है और इस समय सबसे अच्छी कविता नॉर्थ ईस्ट में लिखी जा रही है। इससे पूर्व उत्तर पूर्व से आए शिलांग चैम्बर कोयर बैंड ने वंदे मातरम और पूरे देश को जोड़ने वाली ट्रेन की हलचल को अनूठे अंदाज में प्रस्तुत कर दसवें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की यादगार शुरूआत की।
रंगों, पतंगों का और अब किताबों के त्यौहार
गुलजार ने कहा कि हमारा देश कमाल का है। यहां हर चीज पर त्यौहार है। रंगों का त्यौहार, पतंगों का त्योहार और अब किताबों पर भी त्यौहार होने लगा है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि हर जेएलएफ को हर बार किसी भाषा विशेष से साथ और जोड़ दिया जाना चाहिए। किसी भी भाषा को किसी क्षेत्रीयता में कैसे बांटा जा सकता है। हर भाषा राष्ट्रीय है। आप तमिल को, बंगाली को किसी रीजनल में कैसे बांट सकते हैं।
सियासत कम समझता हूं, लेकिन आमजन की तरह प्रभावित होता हूं
गुलजार ने कहा कि वे सियासत ज्यादा नहीं समझते, लेकिन आमजन की तरह इससे प्रभावित रहते हैं। उन्होंने कहा कि जमाने को बहलाना आसान नहीं होता। आप किसी छोटे समूह या हलके को बहला सकते हो, लेकिन पूरे समाज को नहीं बहलाय़ा जा सकता। उन्होंने कहा कि किसी भी एक व्यक्ति के लिए एक जमाने को बहका लेना आसान नहीं है। पूरे समाज को नहीं बहकाया जा सकता। आपका समाज से जुड़ाव जरूरी है।