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Climate Change: गुजरात-राजस्थान में 50% ज्यादा बारिश की संभावना, हिमालयी क्षेत्रों में वर्षा में भारी कमी

Sun, 17 Nov 2024 11:22 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

गुजरात और राजस्थान में 1960 के स्तर की तुलना में 2021-2024 की अवधि में मध्यम-उत्सर्जन परिदृश्य में 40 प्रतिशत तक और उच्च-उत्सर्जन परिदृश्य में 50 प्रतिशत तक वर्षा में उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है। एक विश्लेषण में कहा गया है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून पूर्व से पश्चिम की ओर स्थानांतरित होगा, जिससे सामान्य रूप से शुष्क पश्चिमी राज्यों में अधिक वर्षा होगी।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
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विस्तार
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एक नए विश्लेषण के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण 2040 तक की अवधि में भारत के पश्चिमी भागों में देश के अधिकांश पूर्वी और पूर्वोत्तर भागों की तुलना में वर्षा में खासी बढ़ोत्तरी होगी। ये रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब देश अजरबैजान में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में विकासशील देशों को ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने में मदद करने के लिए खरबों डॉलर जुटाने के तरीकों पर बहस कर रहे हैं।
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अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय ने किया विश्लेषण
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की तरफ से किए गए विश्लेषण में कहा गया है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून पूर्व से पश्चिम की ओर स्थानांतरित होगा, जिससे सामान्य रूप से शुष्क पश्चिमी राज्यों में अधिक वर्षा होगी। इसमें कहा गया है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य रूप से शुष्क पश्चिमी राज्यों में अधिक वर्षा लाएगा। हालांकि, पूर्वी राज्यों, जैसे कि पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में, कम वर्षा हो सकती है। यह बदलाव इन क्षेत्रों में कृषि प्रणालियों पर और अधिक दबाव डालेगा।

गुजरात और राजस्थान में वर्षा में खासी बढ़ोत्तरी का अनुमान
गुजरात और राजस्थान में 1960 के स्तर की तुलना में 2021-2024 की अवधि में मध्यम-उत्सर्जन परिदृश्य में 40 प्रतिशत तक और उच्च-उत्सर्जन परिदृश्य में 50 प्रतिशत तक वर्षा में उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है। इससे बाढ़, मिट्टी का कटाव और कृषि उत्पादकता में कमी आ सकती है। कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक भारतीय हिमालय में पूर्वोत्तर मानसून के दौरान कम वर्षा होगी। उत्तरी सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे कुछ स्थानों पर 15 प्रतिशत तक कम वर्षा हो सकती है।
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उत्तर-पूर्वी मानसून के दौरान, देश के कई हिस्सों में कम वर्षा होगी, खासकर भारतीय हिमालय में। हालांकि, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और लद्दाख के कुछ हिस्सों में 20 प्रतिशत से 60 प्रतिशत अधिक वर्षा होगी, जिसमें गुजरात में सबसे अधिक वर्षा होगी।

उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अधिक भारी होगी परेशानी
यह उम्मीद की जाती है कि लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और पश्चिमी घाट जैसे उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अधिक भारी वर्षा से समस्याएं पैदा हो सकती हैं, जैसे कि तेजी से बर्फ पिघलना, भूस्खलन और फसलों और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान। आंकड़ों से यह भी पता चला है कि भारत में औसत वार्षिक अधिकतम तापमान सदी के मध्य तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, और उच्च उत्सर्जन परिदृश्यों में यह और भी तेजी से बढ़ेगा।

हिमालयी जिलों में तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी
लेह जैसे हिमालयी जिलों में 1.8 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि देखी जा सकती है। अरुणाचल प्रदेश में सर्दियां 2.2 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो सकती हैं, जिससे ठंडे तापमान पर निर्भर रहने वाली फसलें प्रभावित हो सकती हैं। विश्लेषण में कहा गया है कि तटीय क्षेत्रों और पूर्वी हिमालय के कुछ हिस्सों में खतरनाक वेट-बल्ब तापमान (31 डिग्री सेल्सियस से ऊपर) हो सकता है, जिससे स्वास्थ्य और श्रम उत्पादकता पर काफी असर पड़ सकता है।
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