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गुजरात: आदिवासी कल्याण फंड के उपयोग पर गरमाई सियासत, आप ने वीआईपी कार्यक्रमों के खर्च पर उठाए सवाल

Mon, 22 Dec 2025 10:33 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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आप के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा और दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज। - फोटो : एक्स
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गुजरात में आदिवासी कल्याण से जुड़े फंड के उपयोग को लेकर राजनीतिक बहस गरमा गई है। आम आदमी पार्टी (आप) ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार ने आदिवासी हितों के लिए निर्धारित राशि का बड़ा हिस्सा वीआईपी कार्यक्रमों और स्वागत व्यवस्था पर खर्च किया। सोमवार को दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आप के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा और दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार पर आदिवासी मुद्दों की अनदेखी का आरोप लगाया।

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आप नेताओं ने दावा किया कि प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों के आयोजन पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, जबकि आदिवासी बच्चों की छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सुविधाएं और पोषण योजनाएं संसाधनों के अभाव से जूझ रही हैं। अनुराग ढांडा ने कहा कि आदिवासी समाज के नाम पर बड़े आयोजन तो होते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर छात्रवृत्तियां बंद हैं, सिकल सेल जैसी गंभीर बीमारी के लिए सहायता नहीं मिल पा रही और आंगनवाड़ी से जुड़े भुगतान लंबित हैं।

सौरभ भारद्वाज ने इसे “दिखावटी विकास” बताते हुए कहा कि आदिवासी इलाकों में कुपोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं बनी हुई हैं, जबकि सरकार की प्राथमिकता बड़े मंचों और वीआईपी इंतज़ामों पर खर्च करने की दिखती है।
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आप नेताओं के अनुसार, डेडियापाड़ा से पार्टी विधायक चैतार वसावा द्वारा विधानसभा में पूछे गए सवालों के जवाब में मिली आधिकारिक जानकारी से पता चलता है कि एक कार्यक्रम में पंडाल, डोम, मंच निर्माण, परिवहन और वीआईपी आतिथ्य पर अलग-अलग मदों में करोड़ों रुपये खर्च किए गए। पार्टी का कहना है कि यही राशि यदि शिक्षा और स्वास्थ्य पर लगाई जाती तो आदिवासी क्षेत्रों में ठोस बदलाव आ सकता था।

हालांकि, इस मामले में भाजपा या राज्य सरकार की ओर से अभी कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सरकार इससे पहले विभिन्न मंचों पर यह कहती रही है कि आदिवासी कल्याण के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं और विकास कार्यों पर लगातार निवेश किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह मुद्दा आने वाले समय में गुजरात की सियासत में और तेज हो सकता है, खासकर तब जब आदिवासी क्षेत्रों के विकास और सरकारी प्राथमिकताओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

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