गुजरात पुलिस ने मासूमों के हक में एक बहुत बड़ा कदम उठाया है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में 'ऑपरेशन चाइल्डहुड फ्रीडम' नाम से एक बड़ा अभियान चलाया गया। इस मुहिम के शुरुआती 14 दिनों के भीतर ही पुलिस ने विभिन्न फैक्ट्रियों से 84 बाल मजदूरों को सुरक्षित मुक्त करा लिया है। बच्चों के शोषण के इस काले कारोबार के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए पुलिस ने अब तक 26 आरोपी ठेकेदारों के खिलाफ 16 आपराधिक मामले दर्ज किए हैं। इस अभियान का नेतृत्व उप मुख्यमंत्री हर्ष संघवी कर रहे हैं।
नरक बनी फैक्टरियों पर छापा, ₹200 में हो रहा था सौदा
औद्योगिक इलाकों में चल रहे इस दमन चक्र का सबसे खौफनाक चेहरा सूरत शहर में देखने को मिला। पुलिस ने एक सटीक सूचना के आधार पर जय अंबे टेक्सटाइल्स नाम की कपड़ा फैक्टरी पर अचानक छापा मारा। वहां से दो नाबालिग लड़कों को बेहद अमानवीय परिस्थितियों से छुड़ाया गया। प्रारंभिक जांच में यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि इन मासूम बच्चों को दिनभर की हाड़-तोड़ मेहनत के बदले महज ₹200 रोजाना दिए जा रहे थे।
यह मजदूरी कानूनी और नैतिक दोनों ही मानकों से बहुत कम है। जब भी ये बच्चे लगातार काम करने से मना करते, तो उन्हें डरा-धमका कर जबरन काम पर लगा दिया जाता था। इन मासूमों से सुबह आठ बजे से लेकर शाम सात बजे तक काम लिया जाता था। इस पूरे दिन में उन्हें सिर्फ एक घंटे का लंच ब्रेक मिलता था। पुलिस ने नियोक्ता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम और किशोर न्याय अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया है।
चार चरणों में चलेगा अभियान, टूटेगा माफिया का नेटवर्क
पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) जी एस मलिक ने कहा कि यह अभियान सिर्फ बच्चों को छुड़ाने तक सीमित नहीं रहेगा। पुलिस का पूरा ध्यान इन बच्चों के पुनर्वास और उनकी शिक्षा पर है। अब तक 67 बच्चों का पुनर्वास किया जा चुका है। इसके साथ ही जनता को जागरूक करने के लिए राज्य भर में 160 जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं।
सीआईडी क्राइम के अतिरिक्त महानिदेशक अजय चौधरी ने बताया कि छुड़ाए गए बच्चों में से ज्यादातर बिहार और राजस्थान के प्रवासी हैं। यह साफ तौर पर अंतरराज्यीय मानव तस्करी और लेबर नेटवर्क से जुड़ा मामला है। पुलिस अब सीधे ठेकेदारों और सप्लाई चेन को निशाना बना रही है। इसके लिए एक चार चरणों वाली विशेष रणनीति बनाई गई है।
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पहला चरण: बाल श्रम के हॉटस्पॉट और स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की मैपिंग।
दूसरा चरण: औचक निरीक्षण और रेस्क्यू ऑपरेशन।
तीसरा चरण: बच्चों का पुनर्वास और स्कूलों में दाखिला।
चौथा चरण: अपराधियों और संगठित नेटवर्क पर कानूनी शिकंजा।
इस अभियान के तहत गुजरात पुलिस ने 50,000 से अधिक स्थानों की जांच करने, 10,000 खुफिया इनपुट जुटाने और 5,000 से ज्यादा बाल मजदूरों को छुड़ाने का एक बड़ा लक्ष्य तय किया है।