भाजपा 'गांधी परिवार' पर परिवारवादी राजनीति करने के आरोप लगाती रही है। स्वयं कांग्रेस में भी पार्टी पर गांधी परिवार के वर्चस्व को लेकर समय-समय पर आवाज उठती रही है। हाल ही में विरोधी गुट G23 के नेताओं ने भी कुछ इसी स्वर को हवा देते हुए गांधी परिवार के विरुद्ध अभियान चलाया था। लेकिन गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव परिणामों ने बता दिया है कि कांग्रेस के लिए गांधी परिवार क्यों 'जरूरी' है?
इन चुनावों में प्रियंका गांधी ने हिमाचल प्रदेश में चुनाव प्रचार की कमान संभाली। उन्होंने इस पहाड़ी राज्य में लगभग एक महीने सघन चुनाव प्रचार किया। उन्होंने भाजपा की हिमाचल और केंद्र सरकार की नाकामियों को जमकर उजागर किया, तो कांग्रेस के दावों को जनता के बीच पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उनकी इस कोशिश का परिणाम यह हुआ कि स्वयं प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, पुष्कर सिंह धामी, हिमंत बिस्वा सरमा, स्मृति ईरानी, मनोज तिवारी जैसे हाई प्रोफाइल नेताओं के प्रचार के बाद भी भाजपा चुनाव हार गई और कांग्रेस बड़ी जीत हासिल करने में कामयाब रही।
गुजरात नहीं गया गांधी परिवार
वहीं, गुजरात के चुनाव प्रचार में गांधी परिवार ने 'समय' नहीं दिया। तमाम 'किंतु-परंतु' के बाद भी राहुल गांधी 'भारत जोड़ो यात्रा' यात्रा को छोड़कर गुजरात में चुनाव प्रचार करने के लिए नहीं पहुंचे। उन्होंने केवल शुरुआती दौर में कांग्रेस की कुछ बैठकों और चुनावी सभाओं में भाग लिया, तो बाद में यात्रा छोड़कर एक दिन के लिए गुजरात पहुंचे और दो चुनावी सभाओं को संबोधित किया। पार्टी ने एक सोची-समझी रणनीति के अंतर्गत प्रियंका गांधी को हिमाचल प्रदेश के तरह गुजरात में नहीं झोंका। गांधी परिवार के समय न देने का परिणाम हुआ कि कांग्रेस अब तक के अपने एतिहासिक निचले स्तर पर आकर सिमट गई। उसे गुजरात में केवल 17 सीटों पर जीत मिली।
कांग्रेस के लिए गांधी परिवार की अहमियत इसलिए भी समझ में आती है कि पिछले गुजरात विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी ने गुजरात में टिककर चुनाव प्रचार किया था और कांग्रेस को शानदार 77 सीटों तक की सफलता दिलाई थी। चुनाव विश्लेषकों का प्रश्न है कि यदि कांग्रेस के चुनाव प्रचार में गांधी परिवार की कोई बड़ी भूमिका नहीं है, तो पार्टी गुजरात में बड़ा प्रदर्शन क्यों नहीं कर सकी? जबकि इस बार सत्ता विरोधी रुझान पहले के मुकाबले इस बार कहीं ज्यादा मजबूत था? चुनाव परिणाम बताते हैं कि कांग्रेस की रणनीति से गांधी परिवार को खारिज नहीं किया जा सकता।
राहुल दिला चुके हैं बड़ी जीत
राहुल गांधी पर दूसरे दलों की ओर से नाकामियों के आरोप भले ही लगाए जाएं, लेकिन यह एक तथ्य है कि इन आरोपों के बीच भी राहुल गांधी कई बार पार्टी के लिए बड़ी जीत दिलाने में कामयाब रहे हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण पिछली बार हुए मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान चुनावों में राहुल गांधी की जबरदस्त चुनाव प्रचार के कारण ही कांग्रेस सत्ता में पहुंचने में कामयाब रही थी।
एक प्रश्न किया जा सकता है कि प्रियंका गांधी हिमाचल प्रदेश में ही क्यों सफल हुईं, जबकि इसके पहले इसी साल की शुरुआत में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में पार्टी की ओर से उन्हें खुली छूट दी गई थी, उन्होंने पार्टी के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी, लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस अपने एतिहासिक निचले स्तर के प्रदर्शन पर आकर ठहर गई। 403 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस के केवल दो सदस्य जीत हासिल कर सके। पार्टी को केवल 2.33 फीसदी वोट हासिल हुए, जो इतिहास में सबसे कम हैं।
यूपी में भी दिखी थी प्रियंका की अहमियत
राजनीतिक विश्लेषक राकेश रंजन ने अमर उजाला से कहा कि प्रियंका गांधी ने यूपी में चुनाव प्रचार की जबरदस्त तैयारी की थी। योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर और पूर्वांचल की राजनीति के केंद्र वाराणसी में उनकी जबरदस्त सभाएं यह साबित करने के लिए काफी थीं कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस जमीन पकड़ रही है। कोरोना काल में लोगों के लिए गरीबों-श्रमिकों के लिए काम करना हो, या सरकार के कामकाज में लापरवाही को लेकर सत्तारूढ़ दल पर हमला करना रहा हो, प्रियंका गांधी और यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू के नेतृत्व में पार्टी ने लगातार संघर्ष किया, जबकि सपा-बसपा कहीं मैदान में नजर नहीं आईं। इस कारण पिछली सरकार में कांग्रेस हमेशा सरकार विरोधी मोर्चे पर चर्चा में रही और इसका पूरा श्रेय प्रियंका गांधी को ही जाता है।
राकेश रंजन के मुताबिक, पार्टी को इसका सकारात्मक परिणाम मिल सकता था, लेकिन सरकार बदलने के लिए भाजपा विरोधी मतदाताओं का समाजवादी पार्टी की ओर एकजुट हो जाना, कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ। विशेषकर मुस्लिम मतदाताओं के बीच यह संदेश देने की कोशिश की गई कि योगी आदित्यनाथ सरकार को हटाने के लिए केवल समाजवादी पार्टी ही सक्षम हो सकती है। इससे उनमें भ्रम पैदा हुआ और मतदाता सपा के पास केंद्रित हो गया। इसका नुकसान बसपा के साथ-साथ कांग्रेस को भी हुआ। लेकिन जिस तरह दिल्ली के नगर निगम चुनाव में हुआ, यूपी में भी कांग्रेस का पारंपरिक मतदाता उसकी ओर लौट सकता है, जो पार्टी को दोबारा मजबूत होने में मदद कर सकता है।
उन्होंने कहा कि गांधी परिवार कांग्रेस के लिए वरदान और अभिशाप दोनों है। वरदान इसलिए क्योंकि उसके मैदान में उतरने से ही कांग्रेस कार्यकर्ता उत्साहित होता है, भीड़ इकट्ठी होती है और पार्टी का संदेश दूर-दूर तक जाता है। इसी परिवार के कारण पार्टी में कुछ अनुशासन बना रहता है। अभिशाप इसलिए क्योंकि जिस तरह पीएम मोदी और भाजपा ने गांधी परिवार पर परिवारवादी राजनीति करने का आरोप लगाया है, उससे पार्टी को भारी नुकसान हुआ है। विशेषकर यूपी-बिहार और अन्य उत्तर भारतीय राज्यों में उसे इसका भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस गांधी परिवार को छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकती, क्योंकि पार्टी को दोबारा खड़ी करने में अभी भी केवल यही परिवार सक्षम है। सीताराम केसरी के बाद जिस तरह से सोनिया गांधी ने कांग्रेस को खड़ी करने में सफलता पाई थी, एक बार फिर उसी तरह की परिस्थितियां बनती दिख रही हैं। हालांकि, बदले समय के अनुसार गांधी परिवार को अपनी रणनीति में कुछ बदलाव करने की आवश्यकता है, जिससे उनका वर्षों का पुराना कोई भरोसेमंद 'हिमंत विस्वा सरमा' या 'ज्योतिरादित्य सिंधिया' न बन सके।
गांधी परिवार है कांग्रेस के प्राण
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष विश्व विजय सिंह ने अमर उजाला से कहा कि कांग्रेस का हर कार्यकर्ता स्वयं को गांधी परिवार का 'सैनिक' मानता है। उसे लगता है कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने जो कहा है, उसे पूरा करना उसका कर्तव्य है। जबकि जमीनी तौर पर काफी मजबूत होने के बाद भी दूसरे नेता उसके अंदर वह प्राण नहीं फूंक पाते। यही कारण है कि कांग्रेस का पूरा अस्तित्व गांधी परिवार के इर्दगिर्द सिमटा दिखाई देता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि दूसरे दलों की नाकामी और कांग्रेस के जनता सेवा में जुटे रहने के भाव को देखते हुए मतदाता कांग्रेस की ओर लौटेगा और एक बार फिर देश की राजनीति में कांग्रेस का स्वर्णिम दिन आएगा।