गुजरात उच्च न्यायालय ने कोविड-19 मरीजों के लिए पर्याप्त बेड होने के राज्य सरकार के दावे पर सवाल खड़ा किया। अदालत ने पूछा कि अगर बेड खाली हैं तो संक्रमित व्यक्ति क्यों भर्ती नहीं किए जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने मंगलवार को उच्च न्यायालय में कहा कि कोविड-19 अस्पतालों और अन्य उपचार केंद्रों में 79,944 बेडों में 55,783 ही भरे हैं, बाकी खाली हैं।
सरकारी वकील मनीषा शाह ने मुख्य न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति भार्गव करिया की खंडपीठ के समक्ष एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान तथ्य रखा। खंडपीठ ने दो सप्ताह पहले कोरोना वायरस संक्रमण की स्थिति का स्वत: संज्ञान लेते हुए इस याचिका पर सुनवाई शुरू की थी। मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।'
पीठ ने सरकार से कहा, 'शिकायतें आ रही हैं, शायद आपके पास भी शिकायतें आ रही हों, मरीजों को भर्ती नहीं किया जा रहा है क्योंकि अस्पतालों में जगह नहीं हैं। बेड उपलब्ध नहीं हैं। आपने जो आंकड़ा दिया है, उससे तो यही जान पड़ता है कि निर्धारित अस्पतालों में खाली बेड हैं। तब लोग ईधर-उधर क्यों चक्कर काट रहे हैं, अस्पतालों में बेड और उपचार के लिए पहुंच व पैरवी क्यों ढूढ रहे हैं।'
अदालत ने लोगों के इस दावे पर भी चिंता प्रकट की थी कि अब 108 एंबुलेंस उन मरीजों को लेने आने में काफी वक्त ले रहे हैं जो गंभीर हालत में हैं। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि यदि गंभीर मरीज 108 एंबुलेंस के बजाय यदि निजी वाहन से आते हैं तो उन्हें सरकारी अस्पतालों में क्यों भर्ती नहीं किया जाता है।
सरकार का बचाव करते हुए शाह ने कहा कि वैसे तो मरीजों के घर से कुछ ही दूरी पर कुछ अन्य उपचार केंद्रों में बेड तो हैं लेकिन लोग किन्हीं खास अस्पतालों में ही भर्ती होना चाहते हैं जिससे उन अस्पतालों में सारे बेड भर गए हैं। उन्होंने आश्वासन भी दिया कि सरकार ने मेडिकल ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की है और फिलहाल इस जीवन रक्षक गैस की कोई कमी नहीं है।