जो जीता वही सिकंदर। गुजरात के चुनाव नतीजों के बाद ज्यादातर भाजपा नेताओं से जब पूछा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गृह राज्य के चुनाव नतीजों में सीटों की कमी को पार्टी किस तरह लेती है, तो उनका यही उत्तर था। यानी कुल मिलाकर जीतना लक्ष्य था और पार्टी ने उसे प्राप्त कर लिया । उनका कहना गलत भी नहीं है, लेकिन गुजरात के विधानसभा चुनावों के नतीजे भाजपा के लिए संदेश हैं और कांग्रेस के लिए सबक।
गुजरात में पिछले 22 साल से भाजपा निर्बाध रूप से इस राज्य पर सत्तासीन है और संघ परिवार की पहली हिंदुत्व की प्रयोगशाला भी यही राज्य है। 2001 के आखिरी महीनों में नरेंद्र मोदी जब इस राज्य के मुख्यमंत्री बने तो पार्टी के सामने अगले विधानसभा चुनाव में सरकार बचाने की जबर्दस्त चुनौती थी। भूकंप की त्रासदी से जूझते राज्य में तत्कालीन केशुभाई पटेल के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के खिलाफ लोगों की खासी नाराजगी थी, इसलिए भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में बैठे संगठन के महासचिव नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी।
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इसके पहले मोदी न विधायक रहे थे, न ही सांसद। लेकिन उनकी संगठन क्षमता का लोहा पार्टी मानती थी। मोदी ने गुजरात जाकर न सिर्फ 2002 के गोधरा कांड और उसकी हिंसक प्रतिक्रिया से उपजे वातावरण को हिंदुत्व की लहर बनाकर पार्टी को चुनाव जितवाया बल्कि लगातार तीन बार भाजपा को जीत दिलवाने वाले नरेंद्र मोदी धीरे धीरे पहले भाजपा के फिर देश के लोकप्रिय शिखर पुरुष बन गए।
मोदी के नेतृत्व में 2002 के विधानसभा चुनावों में 126, 2007 में जब पार्टी और संघ परिवार के एक बड़े धड़े ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया था, 117 और 2012 में जब केशुभाई पटेल के नेतृत्व में कई पाटीदार भाजपा नेताओं ने अलग दल बना लिया था, 115 सीटें भाजपा की झोली में डालीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी के करिश्मे ने भाजपा को बहुमत दिलाया और गुजरात की सभी 26 लोकसभा सीटें पार्टी ने जीती और करीब 165 विधानसभा सीटों पर भाजपा ने बढ़त हासिल की।
गुजरात में रहते हुए मोदी और गुजरात एक दूसरे के पर्याय हो गए
गुजरात में रहते हुए मोदी और गुजरात एक दूसरे के पर्याय हो गए और इस राज्य में भाजपा को हराना कांग्रेस के लिए लगभग असंभव सा मान लिया गया। इसीलिए इस बार भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 150 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य रखा।
मोदी के करिश्मे, गुजराती अस्मिता, हिंदुत्व का तड़का, विकास के गुजरात मॉडल, शाह की सियासी कारीगरी, नेताओं और कार्यकर्ताओं की फौज और अपार संसाधन झोंककर भाजपा ने बहुमत का आंकड़ा तो जुटा लिया, लेकिन 150 का लक्ष्य पाना या उसके आसपास पहुंचना तो दूर भाजपा अपनी पुरानी संख्या भी नहीं जुटा पाई। जबकि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 33 जिलों वाले इस राज्य में 34 चुनावी सभाओं संबोधित कीं।
इनमें उन्होंने कांग्रेस नेताओं द्वारा अपने अपमान, पाकिस्तान द्वारा गुजरात चुनाव को प्रभावित करने की कथित साजिश तक का हवाला दिया। इसलिए जीत से खुश होने के साथ ही भाजपा को आत्ममंथन करना होगा कि आखिर उसके अपराजेय गढ़ गुजरात में उसकी सीटें लगातार घट क्यों रही हैं? ग्रामीण गुजरात में कांग्रेस को मिली सफलता और शहरी सीटों पर उसे मिले वोटों के कारणों की पड़ताल भी करनी होगी।
हालांकि लगातार जीत से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल तो बढ़ता है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं आतीं। ग्राम सभा और नगर सभा से लेकर लोकसभा तक भाजपा की सरकार होने के बावजूद अगर उन सवालों को जिन्हें चुनाव में कांग्रेस और राहुल गांधी ने लगातार उठाया है, भाजपा सरकार ने हल नहीं किया तो सवा साल बाद 2019 में अप्रैल में होने वाले लोकसभा चुनावों में इसी गुजरात में भाजपा को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
नेताओं की तैयार करनी होगी नई फसल
गुजरात विधानसभा चुनाव
गुजरात के नतीजों से कांग्रेस के लिए और खासकर उसके नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए बड़ा सबक है। पहला सबक यह है कि भले ही कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया और अपनी सीटें व मत प्रतिशत बढ़ाया, लेकिन जब राज्य में पाटीदार आंदोलन, पिछड़े वर्गों का असंतोष, दलितों का गुस्सा, व्यापारियों और बेरोजागारी से परेशान नौजवानों का आक्रोश भाजपा के खिलाफ मुखर होकर सड़कों पर था और जिस तरह 22 सालों में पहली बार कांग्रेस के पास गुजरात में अपनी सरकार बनाने का मौका था,पार्टी के जमीनी स्तर पर संगठन के अभाव, बूथ प्रबंधन में कमजोरी और गुजरात में कोई कद्दावर नेता न होने से वह मौका हाथ से निकल गया।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जरूर इन चुनावों में अपने नेतृत्व को विकसित किया, छवि बदली, भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया, परस्पर अंतर्विरोधों वाले पाटीदार,ओबीसी और दलित वर्गों के नेताओं हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश को कांग्रेस के साथ लिया। नरेंद्र मोदी अमित शाह और भाजपा के आक्रामक हमलों का जवाब बेहद शालीनता और संयम से देकर चुनावी राजनीतिक विमर्श को अपनी तरफ से नीचे नहीं आने दिया। कांग्रेस को जो भी सफलता मिली है उसका श्रेय राहुल गांधी को ही दिया जाना चाहिए।
लेकिन गुजरात नतीजों से जो सबक कांग्रेस और राहुल गांधी को लेने होंगे, उनमें पहला सबक है कि हर राज्य में पार्टी को कम से कम एक ऐसा चेहरा देना होगा जिसकी पहचान और साख पूरे राज्य में हो। जो न सिर्फ प्रदेश को पूरी तरह जानता हो बल्कि उसकी लोकप्रियता भी सभी क्षेत्रों और वर्गों में हो। पंजाब में अमरिंदर सिंह को आगे करके कांग्रेस ने चुनाव जीता। अगर शंकर सिंह वाघेला कांग्रेस में बने रहते और पार्टी उन्हें आगे करके चुनाव लड़ती तो मुमकिन था कि नतीजों के आंकड़े उलटे होते। गुजरात में कांग्रेस के मौजूदा नेताओं की हालत यह है कि पूर्व अध्यक्ष और पूर्व विधायक दल के नेता अर्जुन मोडवाढ़िया, शक्ति सिंह गोहिल लगातार दूसरी बार तब चुनाव हार गए जब पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत शानदार रहा।
प्रदेश अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी न खुद चुनाव लड़े न उन्होंने राज्य में पार्टी के लिए उस तरह प्रचार किया जैसा कि करना चाहिए। इसलिए राहुल गांधी को गुजरात में भी अब नेताओं की नई फसल तैयार करनी होगी, जिन्हें अभी से लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी को तैयार करना होगा। आने वाले दिनों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्दारमैया एक मजबूत चेहरा हैं, लेकिन राज्य में सरकार के खिलाफ भाजपा सत्ता विरोधी रुझान तैयार करने में जुटी है जो कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती हो सकती है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस को अपना चेहरा तय करना होगा। राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच तालमेल बिठाना जरूरी है। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के मुकाबले कांग्रेस के पास फिलहाल कोई कद्दावर नेता नहीं है।
इन वजहों से पीछे रही कांग्रेस
गुजरात चुनाव
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गुजरात चुनाव में कांग्रेस पाला छूते छूते इसलिए भी रह गई कि भाजपा के मुकाबले उसका बूथ प्रबंधन और जमीनी संगठन बेहद कमजोर रहा। राहुल गांधी के उठाए मुद्दों को जनता तक ले जाने में प्रदेश संगठन विफल रहा और अपने समर्थक मतदाताओं को बूथ तक ले जाने, विपक्षी द्वारा बोगस मतदान को रोकने में कांग्रेस का बूथ प्रबंधन उतना सफल नहीं रहा और भाजपा कई उन सीटों पर बेहद थोड़े अंतर से जीत गई, जो कांग्रेस बेहतर बूथ प्रबंधन से जीत सकती थी।
इस तरह की सीटें दो दर्जन से भी ज्यादा हैं। बूथ प्रबंधन और जमीनी संगठन न होने की यह समस्या कांग्रेस के सामने सिर्फ गुजरात में ही नहीं देश के ज्यादातर राज्यों में है। नए कांग्रेस अध्यक्ष को इस ओर त्वरित ध्यान देना होगा। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस चुनाव को मुकाबले का बना सकती थी, लेकिन पूरे चुनाव को सिर्फ मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के भरोसे छोड़ दिया और कांग्रेस ने सारा जोर गुजरात पर लगाया।
अगर कांग्रेस नेतृत्व हिमाचल प्रदेश के लिए किसी वरिष्ठ नेता के नेतृत्व में एक अलग टीम बनाकर आक्रामक तरीके से चुनाव लड़ता तो मुकाबला कांटे का होता और पार्टी को कामयाबी भी मिल सकती थी। इसका संकेत भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल की हार से मिल जाता है।