पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) के बाद गांधीनगर में स्थित जीबीआरसी देश का दूसरा ऐसा संस्थान बन गया है जिसने वायरस के पूरे जीनोम सीक्वेंस को डिकोड किया है। देश के कई अन्य संस्थान ऐसा करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। राज्य की प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) जयंती रवि ने कहा कि यह खोज गुजरात के लिए सम्मान की बात है।
वहीं, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईसीएमआर) के डॉ. रमन गंगाखेडकर का कहना है कि यह पहला सीक्वेंस नहीं है। पहले भी ये सीक्वेंस पाए जा चुके हैं। ये वायरस अलग-अलग देशों से आया है, इसलिए सभी के सीक्वेंस अलग-अलग हैं। चीन वाले अलग, ईरान वाले अलग। इटली के वायरस में अमेरिका समेत पूरे यूरोप से सीक्वेंस दिखाई दिए थे।
अपने देश में अलग-अलग कोड के वायरस अभी भी हैं। सवाल यहा है कि भारत में ज्यादा संख्या किसकी है और इसका असर किस पर पड़ेगा, दवा पर असर पड़ेगा या नहीं। यह वायरस बहुत जल्दी म्यूटेशन नहीं करता है। यह वायरस भारत में तीन महीने से है और म्यूटेशन इतनी जल्दी नहीं होता। जो भी वैक्सीन सामने आएगी वह वायरस पर तब भी प्रभावी होगी यदि वह म्यूटेट हुआ होगा।
कोरोना वायरस के इलाज के लिए बीसीजी वैक्सीन के इस्तेमाल के सवाल पर डॉ. रमन ने कहा, आईसीएमआर इस पर अगले सप्ताह से अध्ययन शुरू करेगा। तब तक हमारे पास कोई निश्चित परिणाम नहीं हैं। हम स्वास्थ्य कर्मियों को भी इसका इस्तेमाल करने की सलाह नहीं देंगे।