गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए पहले चरण में जिन 89 सीटों पर शनिवार को मतदान होना है, भाजपा ने 2012 में उनमें से 63 सीटें (70 फीसदी) जीती थीं। कांग्रेस को उनमें से 22 सीटों पर जीत हासिल हुई थी, जबकि एक-एक सीट पर एनसीपी और जदयू को और दो सीटों पर गुजरात परिवर्तन पार्टी को कामयाबी हासिल हुई थी।
इस चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पीएएएस) के नेता हार्दिक पटेल भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगा पाएंगे। इसकी वजह यह है कि कच्छ, सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात के जिन इलाकों में पहले चरण का मतदान होना है वहां कई सीटों पर पाटीदारों की अच्छी-खासी संख्या है।
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वैसे पूरे प्रदेश की छह करोड़ की आबादी में पाटीदार 12 फीसदी हैं, लेकिन 16 सीटों वाले सूरत जिले में उनकी संख्या सबसे ज्यादा है। डायमंड सिटी के नाम से मशहूर इस जिले की वराछा रोड, कमरेज, कटरगाम, करंज, ओलपाड़ और उधना में वे किसी भी उम्मीदवार की किस्मत बदलने की हैसियत रखते हैं।
इनमें से वराछा रोड सीट पर तो पाटीदारों की संख्या 70 फीसदी से ज्यादा है। यहां के 1.98 लाख वोटरों में से डेढ़ लाख पाटीदार मतदाता हैं। इससे अलावा सूरत-उत्तर और मजुरा सीट पर भी पाटीदार वोटर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। पिछले चुनाव में भाजपा को सूरत की 16 में से 15 सीटें हासिल हुई थीं, लेकिन पिछले दो साल से चल रहे पाटीदार आंदोलन के कारण समीकरण बदले हुए हैं।
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सूरत के अलावा जूनागढ़ की विसावदर और मानवदर सीटों पर भी पाटीदार जीत-हार में अहम भूमिका निभाने की स्थिति में हैं। इनमें से विसावदर सीट पर पर 2012 में केशुभाई पटेल की गुजरात परिवर्तन पार्टी ने जीत हासिल की थी। हालांकि बाद में उनकी इस पार्टी का भाजपा में विलय हो गया।