लाल है तो काल है। पीला है तो ढीला है। हरा है तो भरा है। बच्चों के वजन केआधार पर बना यह स्लोगन कुपोषण की जंग में कारगर साबित हो सकता है, लेकिन भ्रष्ट तंत्र और आर्थिक तंगी कोख की खुराक में सुराख लगा रहे हैं। जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों पर पंजीकृत गर्भवतियों और बच्चों की संख्या के हिसाब से पोषाहार नहीं मिल रहा है। मां की ममता खून की कमी से जूझ रही है। गर्भवतियों में खून की कमी से बच्चों का वजन कम हो रहा है। आठ महीने की जांच में रामपुर की 22.76 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिक पाई गईं।
इसमें 6.31 फीसदी महिलाएं सीवियर एनीमिक रहीं। वहीं 10.20 प्रतिशत बच्चे जन्म के समय कम वजन के पाए गए। ऐसे में मासूमों का बचपन वजन के चक्कर में लाल, पीले और हरे घेरे में गुजर रहा है। रामपुर में डीएम के गोद लिए गांव उदयराज की मढै़या, प्रभारी मंत्री बृजेश पाठक के गोद लिए गांव काशीपुर, केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के ग्राम पंचायत दनियापुर शंकरपुर, ग्राम पंचायत हकीमपुर के हालात और सरकारी आंकड़े कुछ ऐसी ही तस्वीर पेश करती हैं। वहीं इन हालातों के बीच एक साल में 11,956 कुपोषित बच्चे स्वस्थ हो गए।