हिसार के वन स्टॉप सेंटर में स्टाफ से जब पूछा गया कि पीड़ितों की मदद कैसे की जाती है तो जवाब मिला कि "हम उन्हें होटल से मंगाकर खाना वगैरह खिला देते हैं।"
'मल्टीपर्पस स्टाफ' के तौर पर काम कर रहे युवक से कई बार पूछे जाने पर उसने इतना ही कहा कि वो ज्यादा नहीं जानता क्योंकि उसके सामने कोई पीड़िता नहीं आई। उन्होंने कहा, "सब रात को ही आती हैं, तब मैं यहां नहीं रहता।"
सुबह 11 बजे का समय। महिला पुलिस थाने के परिसर में ही एक प्राथमिक चिकित्सा केंद्र है जिसके सन्नाटे को देखकर लग रहा था कि यहां शायद ही कोई मरीज आता है।
इसी केंद्र में एक कमरा 'वन स्टॉप सेंटर' को दे दिया गया है।
इस कमरे में दो कुर्सी और दो मेज रखे हुए थे। 4-5 बिस्तर थे। उनमें से एक पर चिकित्सा केंद्र की महिला कर्मचारी सो रही थीं।
अगर कोई पीड़िता आए तो वहीं ठहरेगी। कोई और व्यक्ति आए तो वो भी वहीं बैठेगा।
दिशा-निर्देशों के अनुसार, वहां एक प्रशासक मौजूद होना चाहिए था लेकिन बताया गया कि वो आई नहीं हैं।
स्टाफ के दो लोग वहां मौजूद थे जिन्हें विभिन्न कामों (मल्टीपर्पस स्टाफ) के लिए रखा गया था।
प्रशासक सुनीता यादव से फोन पर बात की तो उन्होंने बताया कि वो रेड क्रॉस दफ्तर में हैं।
दरअसल, उनके पास तीन जगहों का चार्ज है और किसी एक जगह मौजूद रहना उनके लिए मुमकिन नहीं है।
रेड क्रॉस के दफ्तर में उन्होंने बताया, "जब तक पूरा स्टाफ नहीं होगा, उनकी ट्रेनिंग नहीं होगी। तब तक तो हम ही काम चला रहे हैं। मेरे पास एक ही महिला स्टाफ है। उसे मैं दिन में रखूंगी तो रात को किसे रखूँ। किसी पीड़िता को सेंटर में रखना है तो किसके भरोसे रखा जाए। सुरक्षाकर्मियों को भी एजेंसी से लाया गया है। अभी केस वर्कर, काउंसलर, पैरा लीगल, पैरा मेडिकल, आईटी स्टाफ है ही नहीं।"
सुनीता यादव की मुश्किलों की लिस्ट बहुत लंबी है। वो कहती हैं, "अथॉरिटी के पास जमीन की कमी है। हमने अप्लाई कर रखा है, लेकिन अभी तक मिली नहीं हैं।"
ये सेंटर कागजों में 30 दिसंबर 2016 को शुरू हो चुका है लेकिन अभी तक 39 केस ही यहां आए हैं।
इनमें घरेलू हिंसा, पारिवारिक झगड़े ही ज्यादा हैं। एक मामला मानव तस्करी का भी था जिसे सुलझाया गया और मुआवजा भी दिलवाया गया।
लेकिन ये महिला पुलिस थाना और वन स्टॉप सेंटर शहर के बाहरी क्षेत्र में है जिसकी वजह से महिलाओं को वहां तक पहुंचने में भी दिक्कत होती है।
'प्रगति कानूनी सहायता केंद्र' हिसार में सक्रिय एक गैर-सरकारी संस्था है जिसे महिलाएं ही चलाती हैं।
वहां सहायता कर रही वकील नीलम भूटानी बताती हैं कि इन सेंटरों में बीच-बचाव और मध्यस्थता वाला माहौल रहता है जो वन स्टॉप सेंटर का मकसद नहीं था।
प्रगति सहायता केंद्र के दफ्तर में घरेलू हिंसा से परेशान पूनम से मुलाकात हुई जो बताने लगी कि पिछले तीन दिन से वो रोज सरसौध गांव से हिसार महिला पुलिस थाना आ रही हैं।
35 साल की पूनम की शादी 2002 में हुई थी। उनकी दो बेटियां हैं जो 12 और 14 साल की हैं।
घरेलू हिंसा से पीड़ित पूनम काफी वक्त से अपने मायके में बेटियों के साथ रह रही हैं।
पूनम ने बताया, "एक साल पहले जब मैं शिकायत लेकर महिला थाना गई थी तो वे बोले कि कोर्ट जाना होगा। अब पिछले तीन दिन से जा रही हूँ लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही। मेरे पास बहुत पैसा तो है नहीं, सिलाई का काम करती हूँ। अब रोज किराया लगा कर शहर आती हूँ। या तो मुझे जवाब ही दे दें कि यहां नहीं होगा कुछ।"
जब पूनम से पूछा गया कि थाने से किसी ने उन्हें साथ वाले वन स्टॉप सेंटर क्यों नहीं भेजा?
उन्होंने कहा कि वो नहीं जानती कि ये क्या है और ना किसी ने उन्हें इसके बारे में कुछ बताया।
प्रगति में काम कर रहीं शकुंतला जाखड़ कहती हैं कि दरअसल, किसी अनपढ़ गरीब की सुनवाई मुश्किल ही है।
शकुंतला पूछती हैं, "पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों में संवेदनशीलता की कमी भी इस तरह की योजनाओं को बेअसर कर देती है। इन सेंटरों के बारे में प्रचार ही नहीं किया गया है तो महिलाएं पहुंचेंगी कैसे?"
मध्य प्रदेश के सागर में बनाए गए सेंटर का हाल हिसार वाले सेंटर जैसा ही है।
सागर के वन स्टॉप सेंटर की प्रशासक राजेश्वरी श्रीवास्तव से जब पूछा गया कि वे पीड़ितों की मदद कैसे करती हैं तो उन्होंने बताना शुरू किया, "एक महिला हमारे पास आई, वो सागर में अपने मायके में रह रही थी। वो चाहती थी कि भरण-पोषण दिलाया जाए। हमने पति के बुलाया तो उसने कहा कि मैं पत्नी को घर ले जाने को तैयार हूँ। हमने उसे समझाया कि तुम सुसराल में रहकर अपनी बेटियों का ध्यान रखो।"
चार बेटियों की इस माँ को सेंटर से कानूनी, मेडिकल मदद या काउंसलिंग मिलनी चाहिए थी लेकिन उसे मिली ससुराल में रहने की सलाह, जहाँ बेटे को जन्म न देने के कारण उसके साथ बुरा सुलूक हो रहा था।
सागर का सेंटर अस्पताल के तो करीब था लेकिन अभी तक किराये की बिल्डिंग में चल रहा था। तीन कमरे बने हुए थे जिनमें से दो पर ताला लगा हुआ था। एक कमरे में प्रशासक राजेश्वरी श्रीवास्तव का दफ्तर था।
उन्होंने बताया कि उनका स्टाफ 15 जनवरी को ही आया है।
हालांकि ये जानकारी भी उन्होंने ही दी कि बजट अप्रैल 2017 में आ गया था।
जब उनसे पूछा गया कि इस सेंटर के बारे में महिलाओं तक जानकारी पहुँचाने के लिए क्या किया जाता है तो उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश की सरकार के बनाए शौर्य दल और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को कहा गया है कि वे पीड़िताओं को यहाँ लेकर आएं।
सागर के मकरौनिया क्षेत्र की एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता से मैंने इस बारे में विस्तार से बात की।
उन्होंने बताया कि वो किसी वन स्टॉप सें स्टर या सखी सेंटर के बारे में नहीं जानती हैं। उन्हें बस निर्देश है कि किसी पीड़िता को परियोजना कार्यालय में लाना है और वो वहीं लेकर जाती हैं।
वहां से उसे कानूनी सहायता के लिए आगे भेज देते हैं।
अगर कोई महिला इस हालत में है कि वापस अपने घर नहीं जाना चाहती तो फिर क्या करते हैं, इस सवाल पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने बताया कि उस मामले में कोई मदद नहीं मिलती। वो इंतजाम पीड़िता को खुद ही करना पड़ेगा।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत ही आते हैं यानी मंत्रालय अपने ही विभागों की सेवा अपनी योजना के लिए नहीं ले पा रहा।
सागर की सावित्री सेन 2013 से घरेलू हिंसा की शिकार हैं। वो बात करते-करते रोने लगती हैं।
वे बताती हैं, "कोई ऐसी सुविधा नहीं मिल रही है जिससे मेरी मदद हो। जब मैं पहली बार पति की मार खाकर महिला पुलिस थाने शिकायत लेकर गई थी तो रात के साढ़े दस बजे तक थाने बैठी रही। मार की वजह से मेरा बच्चा भी कोख में मर गया था। अगले दिन सुबह एक वकील साहब की मदद से मेरी एफआईआर दर्ज हुई।"
उन्होंने बताया कि उन्हें सखी सेंटर के बारे में तो नहीं पता है लेकिन हाल ही में राजेश्वरी जी से बात हुई है।
उनको पिछले 3-4 दिन से फोन भी कर रही हैं लेकिन राजेश्वरी जी फोन नहीं उठा रहीं।
बीबीसी के वहां होने से सावित्री को उम्मीद बनी। वो हमें आस-पास की महिलाओं से मिलाने की बात करने लगीं ताकि उनका दर्द भी सुना जाए। लेकिन सुनवाई की जिम्मेदारी सरकार ने किसी और को सौंपी है।
केंद्र सरकार की वेबसाइट पीआईबी (प्रेस इन्फॉरमेशन ब्यूरो) के मुताबिक इस योजना को 18 करोड़ के सालाना बजट के साथ 2015 में शुरू किया गया था।
साल 2016-17 के लिए इसे 75 करोड़ दिए गए। 2018-19 के लिए 105 करोड़ दिए गए हैं।
जमीन पर दिखी वन स्टॉप सेंटर की हकीकत को लेकर मैंने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का पक्ष जानना चाहा।
उनसे ये भी पूछा गया कि इन दोनों सेंटर में कितना बजट खर्च हुआ और कितना बचा रहा।
इसके लिए 5 फरवरी को हमने मंत्रालय को एक ई-मेल लिखा लेकिन खबर छपने तक उनका जवाब नहीं आया।