दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय के अनुसार, वर्ष 2013 में राजधानी में हरित क्षेत्र केवल 20 प्रतिशत रह गया था, लेकिन अब यह बढ़ते हुए 23.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
दिल्ली का कुल भौगोलिक क्षेत्र 1484 वर्ग किलोमीटर है। इसमें लगभग 18 वर्ग किमी जल क्षेत्र है। सरकार के दावों के मुताबिक 2017 में राजधानी में जंगल क्षेत्र 305.41 वर्ग किमी था जो 2020 में 1.27 प्रतिशत बढ़कर 324.44 वर्ग किमी हो गया। यह दिल्ली की भौगोलिक एरिया का लगभग 21.86 प्रतिशत था। 2022 में यह बढ़कर 342 वर्ग किमी हो गया। इसमें 190 वर्ग किलोमीटर का जंगल क्षेत्र और शेष रिहाइशी इलाकों में पार्क-आवासीय क्षेत्र में लगे वृक्षों के कारण बना हरित क्षेत्र शामिल है। सरकार लगातार ज्यादा वृक्षारोपण कर हरित क्षेत्र बढ़ाने का दावा कर रही है, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों का दावा है कि दिल्ली के पास ज्यादा भूमि न होने के कारण सरकार के पास विकल्प बेहद सीमित हैं।
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दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय के अनुसार, वर्ष 2013 में राजधानी में हरित क्षेत्र केवल 20 प्रतिशत रह गया था, लेकिन अब यह बढ़ते हुए 23.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है। सरकार सड़कों के दोनों किनारों पर लगातार वृक्ष लगाने का अभियान चला रही है। दिल्ली निवासियों को भी हर वर्ष पौधे दानकर अपने घरों और आसपास की जमीनों पर पेड़ लगाने के लिए कहा जा रहा है। आने वाले दिनों में सरकार के इस कदम का असर दिखाई पड़ेगा और दिल्ली के हरित क्षेत्र में और ज्यादा वृद्धि हो सकती है।
सरकार का दावा है कि उसने 2016-17 में 24 लाख, 2017-18 में 19 लाख, 2018-19 में 19 लाख, 2019-20 में 28 लाख और 2020-21 में 32 लाख पौधे लगाए हैं। दावा है कि इस वर्ष 2021-22 में 32 लाख के करीब पौधे लगाए जा चुके हैं।
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भूमि की कमी से नहीं पूरे होंगे दावे
पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, राजधानी की सबसे बड़ी समस्या इसके पास पर्याप्त जमीन का न होना है। वन क्षेत्र और जल क्षेत्र को छोड़कर लगभग पूरी दिल्ली में नियमित या अवैध आवासीय कालोनियां बस चुकी हैं। ऐसे में नवीन वृक्षारोपण कर हरित क्षेत्र को बढ़ाना संभव नहीं है। सरकार के पास केवल यमुना के बाढ़ क्षेत्रों में बेहतर गुणवत्ता के पौधे रोपने का विकल्प बचा हुआ है जिससे राजधानी में पेड़ों की संख्या और उनकी विविधता बढ़ाई जा सके।
सड़कों के दोनों किनारों पर वृक्षारोपण कर हरित क्षेत्र बढ़ाने का विकल्प भी अब सीमित हो चुका है। अधिकतम सड़कों पर दोनों किनारों पर शेष क्षेत्र में वृक्षारोपण हो चुका है तो कुछ में यह कार्य चल रहा है। लेकिन इसी के साथ अलग-अलग एजेंसियों के पास बचे क्षेत्रों में निर्माण कार्य चल रहे हैं। इससे इन रिक्त भूमि पर हरित क्षेत्र कम हो रहे हैं। सरकार कई बार टैरेस फार्मिंग जैसे विकल्प आजमाकर हरित क्षेत्र बढ़ाने के दावे करती है, लेकिन इस तरह के उपाय केवल सजावटी साबित होते हैं। इनसे कभी वह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता जो वन क्षेत्र से होता है। लिहाजा, अब सरकार को केवल यही प्रयास करना चाहिए कि उसके पास जितना क्षेत्र शेष है, उसमें वह स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल बेहतर गुणवत्ता के पौधे लगाए और उनका संरक्षण करे।