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Greater Tipraland: क्या है ग्रेटर टिपरालैंड, त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में क्यों बना यह एक बड़ा मुद्दा?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Tue, 14 Feb 2023 05:02 PM IST

सार

ग्रेटर टिपरालैंड, टिपरा मोथा या त्रिपुरा स्वदेशी प्रोग्रेसिव क्षेत्रीय गठबंधन की मुख्य वैचारिक मांग है।टिपरा मोथा प्रमुख प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा का कहना है कि, 'ग्रेटर टिपरालैंड' मौजूदा त्रिपुरा राज्य से अलग एक राज्य होगा। 
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ग्रेटर टिपरालैंड - फोटो : AMAR UJALA
त्रिपुरा विधानसभा चुनाव का प्रचार आज थम जाएगा। 60 सदस्यीय त्रिपुरा विधानसभा के लिए 16 फरवरी को मतदान होना है। राज्य के चुनाव में अलग प्रदेश 'ग्रेटर टिपरालैंड' की मांग का मुद्दा गरमाया हुआ है। प्रद्योत देबबर्मा की नई नवेली पार्टी टिपरा मोथा चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बना रही है। वहीं, सत्ताधारी भाजपा ने इसे बंटवारे वाली मांग करार दी है। 




आइये जानते हैं आखिर ये ग्रेटर टिपरालैंड क्या है? ग्रेटर टिपरालैंड और टिपरा मोथा का क्या संबंध है? कौन हैं प्रद्योत देबबर्मा? ग्रेटर टिपरालैंड की मांग का इतिहास क्या है? अलग ग्रेटर टिपरालैंड राज्य की मांग का कारण क्या है? इस मांग का विधानसभा चुनाव में क्या असर पड़ सकता है? ग्रेटर टिपरालैंड के विरोध और समर्थन में कौन-कौन?
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ग्रेटर टिपरालैंड - फोटो : AMAR UJALA
त्रिपुरा विधानसभा चुनाव का प्रचार आज थम जाएगा। 60 सदस्यीय त्रिपुरा विधानसभा के लिए 16 फरवरी को मतदान होना है। राज्य के चुनाव में अलग प्रदेश 'ग्रेटर टिपरालैंड' की मांग का मुद्दा गरमाया हुआ है। प्रद्योत देबबर्मा की नई नवेली पार्टी टिपरा मोथा चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बना रही है। वहीं, सत्ताधारी भाजपा ने इसे बंटवारे वाली मांग करार दी है। 




आइये जानते हैं आखिर ये ग्रेटर टिपरालैंड क्या है? ग्रेटर टिपरालैंड और टिपरा मोथा का क्या संबंध है? कौन हैं प्रद्योत देबबर्मा? ग्रेटर टिपरालैंड की मांग का इतिहास क्या है? अलग ग्रेटर टिपरालैंड राज्य की मांग का कारण क्या है? इस मांग का विधानसभा चुनाव में क्या असर पड़ सकता है? ग्रेटर टिपरालैंड के विरोध और समर्थन में कौन-कौन?

क्या है ग्रेटर टिपरालैंड? 
ग्रेटर टिपरालैंड, टिपरा मोथा या त्रिपुरा स्वदेशी प्रोग्रेसिव क्षेत्रीय गठबंधन की मुख्य वैचारिक मांग है। पार्टी ने पिछले सप्ताह एक विजन डॉक्यूमेंट जारी किया, जिसमें कहा गया कि  संविधान के अनुच्छेद 2 और 3 के तहत त्रिपुरा की 19 स्थानीय जनजातियों के लिए एक नया राज्य बनाएगी। 

टिपरा दावा करती है वह त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) क्षेत्रों से आगे बढ़कर कई अन्य गांवों को शामिल करेगी जहां त्रिपुरा के मूल निवासी बड़ी संख्या में रहते हैं। इसके अलावा, पार्टी एक टास्क फोर्स की स्थापना करने की भी बात करती है। टिपरा नेता और TTAADC के अध्यक्ष जगदीश देबबर्मा के अनुसार, मोथा देश और दुनिया के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले टिपरासा (त्रिपुरा के मूल निवासी) के विकास में सहायता करने के लिए टास्क फोर्स बनाएगा। 

टिपरा मोथा प्रमुख प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा - फोटो : Agency (File Photo)
ग्रेटर टिपरालैंड और टिपरा मोथा का क्या संबंध है?
ग्रेटर टिपरालैंड की मांग के पीछे राज्य की क्षेत्रीय पार्टी टिपरा मोथा है जिसने विधानसभा चुनाव में भी मुद्दा बनाया है। बता दें, 2019 में कांग्रेस से अलग होने के बाद प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा ने ‘ग्रेटर टिपरालैंड’ की मांग रखते हुए अलग पार्टी बना ली। इसका नाम टिपरा मोथा रखा। इस मांग में ऑक्सीजन देने का काम TTAADC चुनाव परिणाम ने किया। दरअसल, अप्रैल 2021 में हुए त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (TTAADC) के चुनावों में टिपरा मोथा ने सत्ताधारी भाजपा-आईपीएफटी गठबंधन के साथ सीधे मुकाबले में ‘ग्रेटर टिपरालैंड’ की मांग पर 28 में से 18 सीटों पर जीत हासिल की थी। 

टिपरा मोथा प्रमुख प्रद्योत मानिक्य देबबर्मा - फोटो : Social Media
कौन हैं प्रद्योत देबबर्मा?
प्रद्योत त्रिपुरा के राजशाही परिवार के प्रमुख हैं। वह त्रिपुरा के 185वें और आखिरी राजा किरीट बिक्रम किशोर देबबर्मा और महारानी बीहूबी कुमारी देवी के बेटे हैं। प्रद्योत की पढ़ाई शिलॉन्ग में हुई है। उनके पिता राजा किरीट बिक्रम किशोर देबबर्मा तीन बार लोकसभा के सांसद और मां दो बार विधायक रह चुकी हैं। 

प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा का कहना है कि, 'ग्रेटर टिपरालैंड' मौजूदा त्रिपुरा राज्य से अलग एक राज्य होगा। नई जातीय मातृभूमि मुख्य रूप से उस क्षेत्र के स्वदेशी समुदायों के लिए होगी जो विभाजन के दौरान पूर्वी बंगाल से भारत आए बंगालियों की वजह से अपने ही क्षेत्र में अल्पसंख्यक हो गए थे। 

टिपरा मोथा के अध्यक्ष प्रद्योत देबबर्मा ने कहा- चुनाव के बाद राजनीति छोड़ देंगे
टिपरा मोथा के अध्यक्ष प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मा ने मंगलवार को घोषणा की कि वह 16 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद राजनीति छोड़ देंगे और कभी भी ‘बुबागरा’ (राजा) के रूप में वोट नहीं मांगेंगे। प्रचार के आखिरी दिन यहां एक रैली को संबोधित करते हुए त्रिपुरा के पूर्व शाही परिवार के वंशज ने कहा कि आज राजनीतिक मंच पर मेरा आखिरी भाषण है और मैं विधानसभा चुनाव के बाद कभी बुबागरा बनकर वोट नहीं मांगूंगा। इससे मुझे पीड़ा हुई, लेकिन मैंने आपके लिए एक कठिन लड़ाई लड़ी है।

उन्होंने कहा कि यह निश्चित है कि बुबागरा दो मार्च के बाद राजनीति में नहीं होंगे, लेकिन मैं हमेशा अपने लोगों के साथ खड़ा रहूंगा। मैं स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, गरीबों को छात्रवृत्ति देने के लिए काम करूंगा। देबबर्मा ने यह भी कहा कि वह बंगाली विरोधी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जिस परिवार ने रवींद्रनाथ टैगोर और आचार्य जगदीश चंद्र बोस की मदद की और उनका सम्मान किया, उन्हें बंगाली विरोधी नहीं होने के प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है।

ग्रेटर टिपरालैंड की मांग का इतिहास क्या है?
सीधे तौर पर ग्रेटर टिपरालैंड की मांग पहली बार 2009 में इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) ने उठाई थी। आईपीएफटी द्वारा यह मांग त्रिपुरा की इंडिजिनस नेशनलिस्ट पार्टी (आईएनपीटी) से अलग होने के बाद की गई थी। मौजूदा मांग TTAADC क्षेत्रों से परे है और इसमें कम से कम 36 और गांव शामिल हैं जहां जनजातीय आबादी 20 से 36 फीसदी के बीच है। इसके अलावा यहां नौ प्रतिशत मुस्लिम आबादी भी है। 
 
त्रिपुरा में अलग ग्रेटर टिपरालैंड राज्य की मांग का सबसे बड़ा कारण माना जाता है यहां की जनसंख्या में बदलाव। दरअसल, 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान बंगाली लोगों की एक बड़ी संख्या ने त्रिपुरा में शरण ली। 2011 की जनगणना के अनुसार, बंगाली त्रिपुरा में 24.14 लाख लोगों की मातृभाषा है जो यहां की 36.74 लाख आबादी में से दो-तिहाई है। प्रद्योत अलग राज्य की मांग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अलग राज्य आदिवासियों के अधिकारों और संस्कृति की रक्षा करने में मदद करेगा, जो बंगाली समुदाय के लोगों के आ जाने से अब अल्पसंख्यक हो गए हैं। 

त्रिपुरा विधानसभा चुनाव - फोटो : अमर उजाला
इस मांग का विधानसभा चुनाव में क्या असर पड़ सकता है?
राज्य की 20 विधानसभा सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। 2018 में, IPFT और BJP गठबंधन ने उन 20 सीटों में से 18 जीतीं थीं। 2011 की जनगणना के अनुसार, त्रिपुरा में 11.66 लाख लोग आदिवासी हैं जो कुल जनसंख्या का लगभग एक तिहाई है। यही कारण है कि टिपरा की यह मांग सत्ताधारी भाजपा के सामने मुश्किल पेश कर सकती है। चुनाव से पहले मोथा में कई भाजपा के नेता भी शामिल हुए हैं। 
 

माणिक साहा - फोटो : ANI
ग्रेटर टिपरालैंड के विरोध और समर्थन में कौन-कौन? 
ग्रेटर टिपरालैंड की मांग इस चुनाव में सभी पार्टियों के लिए सिर दर्द बन चुकी है। पिछले दिनों ग्वाला बस्ती और मास्टरपारा इलाके में घर-घर अभियान के दौरान मुख्यमंत्री माणिक साहा ने कहा कि टिपरा मोथा पार्टी की ग्रेटर टिपरालैंड की मांग पूरी होना संभव नहीं है, क्योंकि इसकी प्रस्तावित सीमा न केवल असम और मिजोरम बल्कि पड़ोसी बांग्लादेश से भी गुजरती है। उन्होंने कहा, क्षेत्रीय दल आगामी विधानसभा चुनावों में स्थितियों से लाभ  उठाकर आदिवासी और गैर-आदिवासी लोगों के बीच विभाजन पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, अन्य भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री प्रतिमा भौमिक ने दावा किया कि टिपरा मोथा ग्रेटर टिपरालैंड पाने के नाम पर त्रिपुरा को बांटने की कोशिश कर रहा है। 

इस मुद्दे पर त्रिपुरा कांग्रेस पर्यवेक्षक डॉ. अजय कुमार का कहना है कि ग्रेटर टिपरालैंड की मांग भौगोलिक नहीं है बल्कि बहुसंख्यक मांग का मतलब आदिवासी समाज के समग्र विकास में हुई अनदेखी से है। डॉ कुमार ने यह भी कहा कि संविधान के भीतर सभी कानूनी कदम उठाने होंगे। उधर सीपीआईएम नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि पार्टी संविधान के ढांचे के भीतर चीजों के लिए सहमत होगी।
 
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