जो पहले अधिकारी सीधे इस चर्चा में शामिल हैं, उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों के बीच बड़ी संख्या में श्रमिकों की कम आवाजाही यह प्रस्ताव सुनिश्चित कर सकता है। लेकिन लंबे समय तक काम करने का मतलब उत्पादन क्षमता को उच्चतर क्षमता तक पहुंचाना होगा। इसके लिए श्रमिकों को अतिरिक्त पैसे मिलेंगे, यह उनकी आमदनी की भी समस्या को हल करेगा और उनकी कमाई बढ़ेगी।
जबकि फैक्ट्री कर्मचारी तो पहले से ही ओवरटाइम के हकदार हैं। कानून के अनुसार ओवरटाइम में तीन महीने में अधिकतम 120 घंटे काम करने की मंजूरी है। कानून यह भी कहता है कि ओवरटाइम के प्रत्येक घंटे के लिए, एक श्रमिक मजदूरी की सामान्य दर से दोगुना का हकदार है।
दूसरे अधिकारी ने कहा कि यह संशोधन कर्मचारियों के लिए उच्च आय सुनिश्चित करेगा और श्रमिकों की आवश्यकता को 33 प्रतिशत तक कम कर देगा। यह योजना वर्तमान स्थिति पर पूरी तरह से फिट बैठती है, जब बड़ी संख्या में श्रमिक घर पर या राज्यों द्वारा प्रदान किए गए आश्रयों में रह रहे हैं।
ट्रेड यूनियन नाखुश
हालांकि, ट्रेड यूनियन नेता शिफ्ट की समय बढ़ाने के प्रस्ताव से नाखुश हैं। कुछ फैक्ट्रियों में श्रमिक पहले से ही ओवरटाइम काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार काम के घंटे की अवधि को लंबे समय तक के लिए बढ़ाना चाहती है। इसमें श्रमिकों का फायदा नहीं है। वे कम भुगतान के साथ ही अधिक काम करेंगे।
सीआईटीयू के महासचिव तपन सेन ने कहा कि सरकार को इस सस्ती रणनीति की बजाए, बड़े पैमाने पर छंटनी को लेकर ध्यान देना चाहिए, जिसकी चर्चा अब पूरे भारत के उद्योगों में चल रही है।