फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

संस्कृति बचाने के नाम पर मारे जा रहे ‘जारवा’ आदिवासी नवजात

Tue, 15 Mar 2016 02:54 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली

सार

  • जनजाति के इलाके से 300 स्वायर मील दूर ही रहते हैं बाहरी लोग
  • अलग से बसाए गए हैं ‘बफर जोन’
विज्ञापन
अा‌दिवासी - फोटो : Getty
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

भारतीय द्वीप में अंडमान के जारवा जनजातीय इलाकों में विदेशी या बाहरी लोगों को घुसने तक पर पाबंदियां हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बाहरी लोग इन इलाकों में न केवल घुस रहे हैं बल्कि यहां के लोगों के संपर्क में भी आ रहे हैं।
विज्ञापन


अब हालात यह हैं कि यदि नवजात एकदम काले रंग के साथ पैदा नहीं हों तो मां को डर रहता है कि कहीं उनकी औलाद को जनजाति के दूसरे लोग मार न दें। हालांकि भारत ने जारवा जनजाति की सुरक्षा के लिए उनके संपर्क लगभग पूरी दीन दुनिया से काट रखे हैं लेकिन इस दुर्लभ जनजाति के लोग बाहरी दुनिया के संपर्क में आना शुरू हो गए हैं।

यह जनजाति किसी अविवाहित या विधवा के बच्चे को मार देती है। यही नहीं बल्कि यदि बच्चा ‘जारवा’ जाति से बाहर किसी अन्य व्यक्ति से हुआ है तो उसकी भी हत्या कर दी जाती है। ऐसे कई मामले पिछले वर्षों में सामने आए हैं। लेकिन शिकायत के बावजूद हत्यारों पर कार्रवाई नहीं होती है।  
विज्ञापन


हाल ही में नवंबर में एक पांच साल के बच्चे की हत्या के बाद इस जघन्य कांड के चश्मदीदों ने पुलिस को पूरी जानकारी दी, लेकिन ‘जारवा’ जाति के व्यक्ति पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

हालात इतने गंभीर हैं कि यदि कोई नवजात काले रंग का न होकर कुछ साफ रंग का पैदा होता है तो मां डरती है क्योंकि उसके बच्चे को बाहरी व्यक्ति के संपर्क वाला मानते हुए कोई भी ‘जारवा’ व्यक्ति हत्या कर सकता है, और उसकी कोई सुनवाई तक नहीं होगी। 
विज्ञापन

सरकारी आदेश के कारण पुलिस नहीं करती कार्रवाई

अादिवासी बालक - फोटो : Getty
ऐसे अपराधों को पुलिस द्वारा नजरअंदाज करने का बड़ा कारण जारवा जनजाति की मूलभूत पहचान को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए सरकारी आदेश हैं। यहां पदस्थ इंस्पेक्टर रिजवान हसन के पास इस बाबत स्पष्ट आदेश हैं।

यहां के शासकीय फिजीशियन डॉ. रतन चंद्रकर ने काफी समय तक जारवा लोगों के साथ काम किया है। उन्होंने अपने एक वृतांत में लिखा है कि यह जनजाति समाज में जीन की शुद्धि को लेकर काफी जागरूक रहती है।

उन्होंने बताया कि ‘‘पिछले 12 साल के उनके कार्यकाल में करीब सात मामले ऐसे थे।’’ डॉ. रतन ने आगे लिखा कि ‘‘मैं चूंकि इस जनजाति की परम्परा को जानता हूं इसलिए मैंने कभी इसमें हस्तक्षेप नहीं किया।’’ 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें