लोगों के तापमान की जांच करते स्वास्थ्यकर्मी (फाइल फोटो)
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भारत के राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) जो स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत काम करता है उसने कोरोना वायरस बीमारी के प्रकोप को देखते हुए शहरी मलिन बस्तियों के लिए एक एडवाइजरी जारी की है। इसमें इन क्षेत्रों में रहने वाले हाउस हेल्पर (घरेलू सहायक) को काम से दो हफ्ते का ब्रेक लेने के लिए कहा गया है ताकि न तो उन्हें और न ही उनके नियोक्ताओं को संक्रमण हो।
एडवाइजरी में कहा गया है, ‘पड़ोस में हाउस हेल्पर के रूप में काम करने वाले किसी भी परिवार के सदस्य को दो सप्ताह की अवधि के लिए काम से छु्ट्टी लेने का अनुरोध करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि न तो नियोक्ता और न ही कर्मचारी को कोविड-19 का संक्रमण हो। यदि उन्हें काम पर जाने की आवश्यकता होती है तो उन्हें काम पर जाने से पहले और बाद में साबुन और पानी से हाथ धोने चाहिए।’
भारत के शहरी क्षेत्रों विशेष रूप से मलिन बस्तियों को विभिन्न सर्वेक्षणों में वायरस से सबसे ज्यादा चपेट में पाया गया है। एनसीडीसी की एडवाइजरी में कहा गया है कि लोगों को यह सुनिश्चित करने के लिए स्वयंसेवकों की पहचान करनी चाहिए कि लोग निर्धारित समय के लिए होम क्वारंटीन का पालन करें।
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एडवाइजरी के अनुसार, स्वास्थ्य अधिकारी स्थानीय प्रतिनिधियों/ वार्ड सदस्यों के साथ होम क्वारंटीन में जाने की सलाह देने वालों की सूची साझा करेंगे। यदि कोई इसका उल्लंघन करता है तो स्वयंसेवकों को इसके बारे में सूचित किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि सभी निवासियों को कम से कम 20 सेकंड के लिए लगातार हाथ धोने चाहिए और स्थानीय नेताओं को बीमारी से संबंधित अफवाहों और गलत सूचनाओं के प्रसार की जांच करने की जरूरत है।
यदि किसी इलाके में संक्रमण पाया जाता है तो केंद्र की कंटेनमेंट योजना को लागू किया जाए। दस्तावेज के अनुसार निवासियों को स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ सहयोग करने के लिए कहा गया है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, ‘समुदायों के लिए अपर्याप्त आश्रय और भीड़ भाड़ कोविड-19 जैसी महामारी के संचरण में जोखिम कारक हैं। एक बड़ी आबादी के रूप में अनधिकृत कालोनियों और झुग्गी-झोपड़ी समूहों ने एक गंभीर मानवीय समस्या पैदा की है।’
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा हालिया सेरोलॉजिकल सर्वे में शहरी बस्तियों में लगभग 1.89 प्रतिशत लोगों का सर्वेक्षण किया गया। वहीं शहरी क्षेत्रों में 1.09 प्रतिशत का सर्वेक्षण किया गया। इससे पता चलता है कि यहां सार्स-कोव-2 का संक्रमण तेजी से फैला है। सेरो सर्वेक्षण खून के नमूनों की जांच के जरिए किया जाता है ताकि खून में सार्स-कोव-2 के खिलाफ एंटीबॉडी की उपस्थिति का निर्धारण किया जा सके।