शहरी गरीबों को किराये का घर मुहैया कराने के लिये केंद्र सरकार ने नीतिगत दस्तावेज तैयार कर लिया है। इसमें गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को रेंटल बाउचर दिया जाएगा। सबसे पहले इस योजना को 100 स्मार्ट शहरों में लागू किया जायेगा। अधिकारियों की मानें तो इसी हफ्ते से पॉलिसी का ड्राफ्ट संबंधित मंत्रालयों को भेजा जा रहा है। एक महीने में फीडबैक मिलने के बाद इसे कैबिनेट में रखा जाएगा।
दरअसल, आवास और शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय (हूपा) ने रेंटल हाउसिंग पॉलिसी तैयार की है। इसका मकसद ऐसे लोगों को किराये का घर लेने में मदद करना है, जिन्हें पैसा न होने के कारण झुग्गी बस्तियों में रहना पड़ता है।
उनके लिये सरकार रेंटल बाउचर लाएगी। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोग सरकार से बाउचर लेकर मकान मालिक को दे देंगे। मकान मालिक स्थानीय निकायों में बाउचर जमा कराके नकदी ले सकेंगे। खास बात यह कि सरकार की तरफ से तय रकम से ज्यादा किराया होने पर अतिरिक्त राशि किरायेदार को देनी पड़ेगी। मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, रेंटल पॉलिसी की शुरुआत 100 स्मार्ट शहरों से करने की योजना है। इस पर सालाना करीब 2,713 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
रेग्युलेटर तय करेगा किराया
हर राज्य में एक रेंटल हाउसिंग रेग्युलेटर की तैनाती होगी। रेंटल रेग्युलेटर किराए की राशि तय करेगा। इसका आधार मार्केट रेट होगा। वहीं, शहरों की कैटेगरी भी ध्यान में रखी जाएगी। रेंटर बाउचर की कीमत तय करने के साथ रेग्युलेटर शहर में किराये की अधिकतम राशि भी तय करेगा। इससे मकान मालिकों की मनमर्जी खत्म होगी। दूसरी तरफ अगर बाउचर से ज्यादा की कीमत का मकान लेता है तो अतिरिक्त राशि का भुगतान किरायेदार को करना होगा।
मकान मालिक को भी मिलेगा इंसेंटिव
सरकार मकान मालिकों को किराये वाले मकानों पर प्रॉपर्टी टैक्स, स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन समेत दूसरे शुल्कों में बतौर इंसेंटिव छूट दे सकती है। इससे लोग रेंटल हाउसिंग स्टॉक में शामिल होंगे। एक अनुमान के अनुसार, देश के शहरी क्षेत्रों में करीब 2 करोड़ घरों की कमी है। वहीं, 2011 में करीब 1.10 करोड़ घर खाली पड़े हैं। इस अंतर को पाटने के लिये खाली मकान भी रेंटल पॉलिसी के दायरे में होंगे।