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अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर मोदी सरकार का पक्ष राजनीति से प्रेरित: एएमयू

Wed, 17 Aug 2016 06:45 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ नई दिल्ली
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एएमयू - फोटो : अलीगढ़/ब्यूरो
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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय(एएमयू) के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर मौजूदा एनडीए सरकार के पक्ष को विश्वविद्यालय ने राजनीति का हिस्सा करार दिया है। एएमयू का कहना है कि महज इसलिए कि केंद्र सरकार में अलग राजनीतिक विचारधारा वाली सरकार आ गई है तो सरकार अपना रुख नहीं बदल सकती। 
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मालूम हो कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि एएमयू अल्पसंख्यक सस्थान नहीं है। इस फैसले को यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। लेकिन मोदी सरकार केकेंद्र में काबिज होने केबाद केंद्र ने अपना पक्ष बदल दिया। मोदी सरकार ने हाईकोर्ट केफैसले के खिलाफ दाखिल की गई अपील को वापस लेना चाहती है और इस संबंध में उसने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर इसकी इजाजत मांगी है। 

केंद्र सरकार के नए रुख के जवाब में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में एएमयू ने कहा है कि मौजूदा केंद्र सरकार ने अपना रुख इसलिए बदला है क्योंकि उसकी राजनीतिक विचारधारा अलग है। कोई भी राजनीतिक दल अपने राजनीतिक आदर्शों की वजह से पिछली सरकार से अलग रुख नहीं ले सकती। खासतौर पर तब जब पक्ष में बदलाव रूल ऑफ लॉ के उलट हो।
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एएमयू ने एनडीए सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि वह विश्वविद्यालय केअल्पसंख्यक दर्जें के खिलाफ इसलिए नहीं जा सकती क्योंकि ऐसा करना असंवैधानिक, गैरजिम्मेदारना है। ऐसा करना केंद्र सरकार की संवैधानिक दायित्वों से जानबूझ मुंह मोडना है। 

हलफनामे में एएमयू का कहना है कि विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक दर्जा सभी मुस्लिमों के लिए बहुत मायने रखता है। केंद्र सरकार को 1981 में संसद द्वारा पारित कानून को चुनौती देने की इजाजत नहीं दी जा सकती। मालूम हो कि 1981 में संसद में अदालती आदेश को बदलते हुए एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा वापस दिया था। 
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विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर कभी विवाद नहीं था

एएमयू - फोटो : अलीगढ़/ब्यूरो
एएमयू ने कहा है कि सरकार में बदलाव होने से पूर्व में सरकार के स्तर पर लिए गए निर्णय को शून्य नहीं ठहराया जा सकता, वह भी तब जब निर्णय पूरे देश के हितों को प्रभावित करता हो। गत 30 जून को मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय द्वारा दाखिल हलफनामे में कहा गया था कि न्यायिक आदेश से 1981 में हुए संशोधन को नहीं छीन जा सकता। एएमयू ने कहा कि संसद द्वारा न्यायिक अधिकारों का छीनना असंवैधानिक है। एएमयू का कहना है कि सरकार को अपील वापस लेने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। 

एएमयू ने इस मामले को ऐतिहासिक बताते हुए अमाइकस क्यूरी को नियुक्त करने की गुजारिश करते हुए कहा है कि विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर कभी विवाद नहीं था क्योंकि कुलपति और प्रो-चांसलर आदि की नियुक्ति को लेकर विश्वविद्यालय के संदर्भ में प्रजातांत्रिक व्यवस्था मौजूद है। 

हलफनामे में एएमयू ने यह भी कहा कि सरकार आरक्षण और अल्पसंख्यक संस्थान में विभेद के अंतर को समझने में नाकाम रही है। अल्पसंख्यक राज्य केस्तर पर तय होता है। यहां तक कि कुछ राज्यों में हिन्दुओं ने भी अल्पसंख्यक संस्थान बना सकते हैं और अपने समुदाय केलिए सीटें आरक्षित कर सकते हैं। एएमयू का यह भी कहना है कि अनुदान देने या न देने से अल्पसंख्यक संस्थान का चरित्र नहीं बदल सकता। 

मंगलवार को केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की अध्यक्षता वाली पीठ से एएमयू के पक्ष पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए तीन हफ्ते का वक्त मांगा, जिसकी अदालत ने मंजूरी दे दी।
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