सरकार ने कृषि कानूनों के मामले में खुद हस्तक्षेप करने से बचने और सब कुछ सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ने का साफ संदेश दिया है। बजट सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने अभिभाषण में तो कृषिमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इसी आशय का साफ संदेश दिया है। ऐसी परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति की भूमिका फिर से महत्वपूर्ण हो गई है।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शुक्रवार को दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए कृषि कानूनों की जमकर तारीफ की और यह भी कहा कि वर्तमान में कृषि कानूनों को लागू करने पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखा है। हमारी सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का पूरा सम्मान और उसका पालन करेगी।
वहीं, तोमर ने भी कहा, सरकार किसान संगठनों को कोई नया प्रस्ताव नहीं देगी। सरकार ने अपनी ओर से तीनों कानूनों को स्थगित करने और सर्वपक्षीय समिति बनाने का सबसे अच्छा प्रस्ताव पहले ही दे दिया है। अब इससे आगे सरकार कुछ नहीं करेगी।
किसान संगठन नहीं माने तो सुप्रीम कोर्ट अहम
राष्ट्रपति के अभिभाषण और कृषिमंत्री के बयान से साफ है कि किसान संगठन अगर अपनी जिद पर अड़े रहे तो सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा करेगी। अगर इस बीच किसान संगठनों ने सरकार के प्रस्ताव पर सहमति दिखाई तो पूरे विवाद में बीच का रास्ता निकल सकता है। सुप्रीम कोर्ट की समिति को दो महीने में अपनी रिपोर्ट देनी है। इसने अपना काम शुरू भी कर दिया है।
समिति की प्रासंगिकता पर उठ रहे थे सवाल
सरकार द्वारा कृषि कानूनों को डेढ़ साल के लिए स्थगित करने और सभी पक्षों से बातचीत के लिए कमेटी गठन के प्रस्ताव के बाद सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय समिति की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे थे।
जाहिर तौर पर अगर किसान संगठन सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते तो समिति की प्रासंगिकता खत्म हो जाती। अब सरकार और किसान संगठनों के बीच जारी रस्साकसी के बीच सरकार ने पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ने का मन बना लिया है। ऐसे में समिति की अहमियत फिर बढ़ गई है।