बयान में "यूनेस्को के एटलस औफ द वर्ल्ड्स लैंग्वेजेज इन डेंजर" का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत में अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण जनपदीय भाषाएं और बोलियां तेजी से खत्म हो रही हैं। 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 भाषाएं और बोलियां प्रचलन में थीं, जबकि 2001 की जनगणना के मुताबिक देश में मात्र 114 भाषाएं और 234 बोलियाँ ही प्रचलन में बची हैं।
जाहिर है कि भाषाओं के क्षरण के साथ हमारी सांस्कृतिक विरासत और विशिष्टताएं भी खत्म हो रही हैं। यह भारत के बहुलतावादी समाज के लिए बहुत चिंताजनक है। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि सरकार भारत की भाषा - समस्या के प्रति गंभीर बने और वह हर संभव कदम उठाए, जिससे कि केंद्रीय सरकार के कामकाज हिंदी में हों और प्रादेशिक सरकारों के कामकाज प्रादेशिक भाषाओं में।
बयान के अनुसार भारतीय समाज के लिए यह कितना विडंबनापूर्ण है कि यहां अंग्रेजी प्रतिष्ठा की भाषा समझी जाती है, जबकि हिंदी सहित तमाम भारतीय भाषाएँ पिछड़े विचार और चिंतन की भाषा मानी जाती हैं। यह प्रवृत्ति अगर समय रहते खत्म नहीं की गई तो देश भाषाई और सांस्कृतिक गुलामी के दलदल में फंस जाएगा। बयान में याद दिलाया गया है कि भाषा मनुष्य की अभिव्यक्ति का माध्यम होती है। साथ ही अपने वक्ता समाज की संस्कृति का वाहक भी।
बयान में प्रधानमंत्री से यह भी अपील की गई है कि एक सुविचारित नीति के तहत सभी हिंदी प्रदेशों में माध्यमिक शिक्षा तक देश के दक्षिणी राज्यों की किसी एक भाषा का तीसरी भाषा के रूप में अध्ययन अनिवार्य किया जाए ताकि पूरे देश में भाषाई समरसता और अपनत्व का भाव पैदा हो।
बयान में शीर्ष पूर्व अधिकारियों ने भारत में अंग्रेज़ी के बढ़ते वर्चस्व और देशी भाषाओं के प्रति हीन भावना को भारत के लोगों में अंतर्दृष्टि तथा मौलिक उद्भावना के विकास के लिए खतरनाक बताया है। साथ ही प्रधानमंत्री से अपील की है कि वे नया भारत और विकसित भारत बनाने के लिए हिंदी और अन्य प्रांतीय भाषाओं के प्रयोग और विकास की दिशा में जरूरी निर्णय लें ।