कोरोना संक्रमण के दौरान ग्रामीण भारत के लिए 'मनरेगा' को देवदूत की संज्ञा दी गई थी। उस वक्त बड़े पैमाने पर शहरों से ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिकों का पलायन हुआ था। इसके चलते केंद्र सरकार ने मनरेगा के तहत अतिरिक्त बजट का प्रावधान कर दिया था। सितंबर 2020 में रोजगार मांग का स्तर 22 करोड़ से ज्यादा हो गया था, जबकि सितंबर 2019-20 के दौरान रोजगार की मांग 16 करोड़ से अधिक थी।
केंद्र सरकार को मनरेगा के लिए 40,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त बजट का प्रावधान करना पड़ा। पूरे वित्त वर्ष में सरकार ने इस योजना पर कुल एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की धनराशि आवंटित की थी। गत वर्ष पहली छमाही के दौरान ही मनरेगा पर 64,000 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके थे। वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में मनरेगा के लिए 73,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, यदि इसकी तुलना बीते वित्त वर्ष के संशोधित बजट के आवंटन 111,500 करोड़ रुपये से की जाए तो यह करीब 34.52 फीसदी कम है।
अनुपम कहते हैं, जैसे पिछली बार पीएम नरेंद्र मोदी ने एकाएक जो घोषणा की थी, लोगों के जेहन में अब वही यादें ताजा होने लगी हैं। दरअसल, लोगों को सरकार पर भरोसा नहीं रहा। एक साल तक कोरोना संक्रमण से जूझने के बाद भी सरकार ने कुछ सीखा नहीं। इस बार भी सरकार सजग नहीं है। चुनावी राज्यों में जिस तरह से रैलियों की भरमार है, वह कोरोना संकट की एक बड़ी दस्तक की आहट है।
यह अलग बात है कि सरकार अभी तक इसे गंभीर नहीं मान रही है। पिछले साल कोरोना ने ज्यादा आयु वाले लोगों को अपनी चपेट में लिया था, लेकिन इस बार युवा भी कोविड 19 से बच नहीं पा रहे हैं। गत वर्ष सरकार के पास यह कहने के लिए एक बहाना था कि ये बीमारी तो नई है। ये अचानक आ गई है, तो तैयारियों के लिए समय ही नहीं मिल सका। इस बार भी पहले की तरह हमें यह सुनने को मिल रहा है कि अस्पताल में बिस्तर नहीं हैं या वैंटीलेटर का अभाव है तो इसका मतलब सरकार ने कुछ नहीं सीखा।
अनुपम के अनुसार, सरकार ने गत वर्ष अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए बीस लाख करोड़ रुपये का पैकेज जारी किया था। उसका ज्यादा लाभ नहीं हुआ। वजह, वह पैसा लोगों को डायरेक्ट तो मिलना नहीं था। जनता बैंक से लोन ले सकती थी। इस बार गत वर्ष के मुकाबले ज्यादा बुरी हालत है। सरकार को ग्रामीण क्षेत्र के लिए मनरेगा की राशि बढ़ानी होगी। अकुशल श्रमिकों के लिए नई योजनाओं की घोषणा करनी पड़ेगी। सरकार को चाहिए कि वह शहरों से पलायन को रोके। लोगों के पास कामधंधा नहीं रहा, इसलिए वे अपने गांव लौट रहे हैं।
अगर सरकार उन्हें यहीं पर आर्थिक मदद दे तो वे नहीं जाएंगे। जब पलायन रुकेगा तो कोरोना संक्रमण को भी ग्रामीण क्षेत्रों में फैलने से रोका जा सकेगा। शहरों में कहीं इलाज भी हो सकता है, लेकिन गांव में श्रमिकों की कौन सुध लेगा। कई राज्यों में रेलवे स्टेशनों के बाहर लोगों की भीड़ बढ़ने लगी है। सरकार को इस बार लोगों के दिमाग से 'डर और मजबूरी' को बाहर निकालना होगा।
बजाज ऑटो लिमिटेड के एमडी राजीव बजाज ने कोरोना संक्रमण को लेकर अपने एक बयान में कहा है कि भारत को कोरोना वायरस पर काबू पाने के लिए लॉकडाउन के अलावा अन्य समाधान पर भी विचार करना चाहिए। उन्होंने एशिया के कुछ अन्य देशों का उदाहरण दिया था। बजाज ने कहा, लॉकडाउन के बिना भी कई दूसरे ऐसे कदम उठाए जा सकते हैं, जिससे कोरोना संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है। कोरोना की दूसरी लहर में 95 फीसदी केस बिना लक्षण या मामूली लक्षण के साथ आ रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में लॉकडाउन का कोई फायदा नहीं होगा। महाराष्ट्र के कई इलाकों में वीकेंड लॉकडाउन और नाइट कर्फ्यू लगाया गया है। इससे 13 करोड लोगों की आजीविका पर असर पड़ा है। लॉकडाउन से लोगों के जीवन यापन पर गहरा असर पड़ता है। इससे देश में आर्थिक गतिविधियां ठप हो जाती हैं और लोग गरीबी की तरफ बढ़ने लगते हैं।