बीते कुछ महीनों से सस्ती दालें खरीदने के आदि हो चुके आम नागरिकों को आने वाले दिनों में महंगी
दालें खरीदनी पड़ सकती हैं, क्योंकि इसके लिए शीर्ष स्तर पर कुछ बड़े फैसले लिए जाने की प्रक्रिया चल रही है। दरअसल, सरकार चाहती है कि घरेलू बाजार में दालों की कीमतों में इजाफा हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि रबी मौसम में बोये गए चने और मसूर की फसल जब तैयार हो, तो किसानों को बाजार में कम से कम सरकार द्वारा घोषित
न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के बराबर कीमत तो मिल ही जाए।
अभी तो हालत यह है कि थोक बाजार में न सिर्फ चना बल्कि मसूर, उड़द, मूंग, अरहर भी एमएसपी से नीचे बिक रहे हैं। बाजार में ऐसी स्थिति घरेलू उत्पादन की वजह से नहीं, बल्कि बंपर आयात की वजह से हो गई है।
केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि एक जनवरी, 2018 को देश में 16.97 लाख टन दालों का बफर स्टॉक था। इस समय रबी मौसम में चने और मसूर की फसल खेतों में है। इसके अलावा कर्नाटक, बिहार, झारखंड समेत कई राज्यों में अरहर की फसल तैयार होने वाली है। अगले दो महीने में ये फसलें बाजार में आ जाएंगी, जबकि अभी बाजार में आयातित दालों की इतनी उपलब्धता है कि उसे यदि फसल की कीमत से जोड़ा जाए, तो यह एमएसपी से भी कम पड़ रहा है।
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उपरोक्त टेबल में दाल के भाव दलहन के एमएसपी से अधिक है। इसका कारण यह है कि एमएसपी दलहन का होता है न कि दाल का। किसी भी दलहन की मिलिंग, पैकिंग और परिवहन में करीब दस रुपये प्रति किलो का खर्च आता है यानी दलहन के एमएसपी पर प्रति क्विंटल करीब 1,000 रुपये जुड़ जाता है, इसके बाद दाल थोक बाजार में पहुंच पाता है।
आयात शुल्क बढ़ोतरी का असर नहीं
दाल की हो रही तस्करी
- फोटो : PTI
घरेलू बाजार में दालों कीमत में तेजी लाने के लिए सरकार ने कुछ महीने पहले अरहर, मूंग और उड़द के आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध लगाया था, लेकिन उसका असर कोई खास नहीं दिखा। इसके बाद बीते 21 दिसंबर को चना एवं मसूर के आयात पर शुल्क 10 फीसदी से बढ़ा कर 30 फीसदी कर दिया गया। इससे पहले पीली मटर के आयात पर शुल्क 50 फीसदी किया जा चुका है। इसका असर भी बाजार में ज्यादा दिन तक नहीं दिखा और इस समय थोक बाजार में दालों की कीमत काफी कम है।
चना, मसूर का रकबा बढ़ा
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि सरकार के प्रयासों से इस बार रबी मौसम में चने और मसूर की फसल के रकबे में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। बुवाई के अद्यतन आंकड़ों के मुताबिक, अभी तक करीब 99 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में चने की बुवाई हुई है, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 10 लाख हेक्टेयर ज्यादा है। इसी तरह करीब 16 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मसूर की बुवाई हुई है, जो पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी है।
एमएसपी पर खरीद सकती है सरकार
इस क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यदि किसानों को चना, मसूर और अरहर की बाजार में उचित कीमत नहीं मिलेगी तो सरकार को हस्तक्षेप करते हुए एमएसपी पर खरीद करनी होगी। यह काफी महंगा पड़ेगा। कर्नाटक सरकार ने तो किसानों से अरहर 6,600 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर खरीद की घोषणा भी कर दी है जो बाजार की कीमत से काफी ज्यादा है।