किसानों के लिए यह दिवाली काफी अच्छी साबित हुई है। सरकार ने पिछले वर्ष की इसी समयावधि की तुलना में इस बार धान की 20.3 फीसदी ज्यादा खरीद की है। इसका सबसे ज्यादा फायदा पंजाब-हरियाणा के किसानों को मिला है जहां से लगभग 70 फीसदी धान की खरीद की गई है। हालांकि, इसके बाद भी किसानों की सरकार से नाराजगी जारी है। किसानों ने आरोप लगाया है कि धान की फसल की ज्यादा खरीद कर सरकार उनके आंदोलन को कमजोर करना चाहती है, लेकिन वे नए कृषि कानूनों के वापस लिए जाने तक आंदोलन जारी रखने के लिए तैयार हैं।
सरकार ने इस साल पंजाब-हरियाणा में 26 सितंबर से और अन्य राज्यों में एक अक्टूबर से धान की खरीद शुरू कर दी थी। इस सीजन में 15 नवंबर तक 281.28 लाख टन धान की खरीद की जा चुकी है। यह पिछले वर्ष की तुलना में 20.3 फीसदी ज्यादा है। कुल खरीद में पंजाब-हरियाणा के किसानों का हिस्सा लगभग 70 फीसदी है।
किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने अमर उजाला को बताया कि सरकार ने गैर-बासमती धान की फसल के लिए 1868 रुपये प्रति क्विंटल का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया है। लेकिन खुले बाजार में इसकी कीमत 1400-1500 रुपये से ज्यादा नहीं मिल रही है। पूसा बासमती 1121 और पूसा बासमती 1509 का मूल्य तीन हजार रुपये प्रति क्विंटल मिलना चाहिए, लेकिन बाजार में इसे 2000 रुपये से ज्यादा का दाम नहीं मिल रहा है। इस प्रकार गैर-बासमती धान की फसल पर किसानों को प्रति क्विंटल 300-400 रुपये और बासमती चावल पर एक हजार रुपये प्रति क्विंटल का घाटा हो रहा है।
कृषि मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019-20 में कुल 760.40 लाख मिट्रिक टन धान की खरीद की गई थी। इसमें पंजाब से सबसे ज्यादा 162.33 लाख मिट्रिक टन, तेलंगाना से 111.26 लाख मिट्रिक टन, आंध्रप्रदेश से 79.68 लाख मिट्रिक टन और ओडीशा से 70.57 लाख मिट्रिक टन की खरीद की गई थी।
भारतीय किसान यूनियन चढ़ूनी के नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने कहा कि नियमों के अनुसार फसल की खरीद के 72 घंटे के अंदर किसान को उसका पैसा मिल जाना चाहिए। लेकिन पंजाब-हरियाणा के अनेक किसानों का पैसा खरीद के डेढ़ महीने बीत जाने के बाद भी नहीं मिला है। किसानों का आरोप है कि पंजाब-हरियाणा में ही सबसे ज्यादा खरीद के पीछे यही कारण है कि सरकार धान की ज्यादा खरीद कर नाराज किसानों का गुस्सा कम करने की कोशिश कर रही है, जबकि देश के अन्य राज्यों में भी किसानों को पैसे की जरूरत है और उनकी फसलों की खरीद भी जल्द से जल्द की जानी चाहिए।
किसानों ने नए कृषि कानूनों के विरोध में 26 नवंबर को दिल्ली घेरने का एलान कर रखा है। इसके लिए पंजाब के अंबाला बॉर्डर से किसान 25 नवंबर को कूच करेंगे। कोंडली बॉर्डर के रास्ते किसानों का दिल्ली में प्रवेश करने का कार्यक्रम है। किसानों ने आंदोलन के लिए दिल्ली के रामलीला ग्राउंड की मांग की थी, जिसे प्रशासन ने इनकार कर दिया था।
वहीं, दिल्ली में कोरोना की गंभीर स्थिति देखकर सरकार बड़ी भीड़भाड़ इकट्ठा करने पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रही है। ऐसे में किसान आंदोलन के भविष्य पर भी कोरोना के संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जानकारी के मुताबिक इस पर एक-दो दिन में अंतिम निर्णय लिया जा सकता है।