विश्वविद्यालयों में नियुक्ति के लिए 200 प्वाइंट की जगह 13 प्वाइंट रोस्टर लागू करने के मामले में सरकार और भाजपा ने संसद को हथियार न बनाने का मन बनाया है। पार्टी और सरकार को इस बात का डर है कि ऐसा करने से एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के लिए संसद के उपयोग से उपजी सामान्य वर्ग में नाराजगी फिर से बढ़ सकती है। यही कारण है कि सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का फैसला किया है।
सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री के मुताबिक इस मामले में उपजे विवाद के बाद पीएमओ में दो हफ्ते पूर्व हुई माथापच्ची में संसद में कानून के जरिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 13 प्वाइंट रोस्टर लागू करने के आदेश को पलटने के विकल्प पर बात हुई थी। मगर दो दिन पूर्व हुई बैठक में इस विकल्प पर न बढने का फैसला किया। उक्त मंत्री के मुताबिक एससी-एसटी एक्ट को पुराने स्वरूप में बहाल करने के लिए संविधान संशोधन से सामान्य वर्ग बेहद खफा था। इन वर्ग की नाराजगी दूर करने के लिए हाल ही में इस वर्ग के लिए 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया।
अब जबकि पार्टी की आंतरिक रिपोर्ट में सामान्य वर्ग की नाराजगी दूर होने का दावा किया जा रहा है, तब इस विवाद में एक बार फिर संसद को हथियार बनाने से यह वर्ग फिर से नाराज हो सकता है। चूंकि आमचुनाव सिर पर है। इसलिए सरकार और पार्टी कोई खतरा नहीं उठाना चाहती। यही कारण है कि सरकार ने इस मामले में सरकार ने संसद में पहल करने के बदले सुप्रीम कोर्ट में पुनिर्वचार याचिका दायर करने का निर्णय लिया।
क्या है विवाद
दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालयों में नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय के बदले विभाग को मानक मानने का फैसला किया। सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। मगर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से इंकार कर दिया। इसके बाद विपक्ष के साथ ही सहयोगी दलों लोजपा, आरपीआई और अपना दल ने इस मामले में पीएम से हस्तक्षेप की मांग की। सहयोगी दलों की यह भी मांग थी कि पुराना 200 प्वाइंट रजिस्टर लागू करने के लिए कानून लाने की भी मांग की थी।