सरकार ने अब आईटी नियमों में क्या बदलाव किया है?
इन संशोधनों को केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की तरफ से सूचना-प्रौद्योगिकी कानून, 2000 की धारा 87 के जरिए मिली ताकतों का इस्तेमाल करते हुए पेश किया गया है।
सिंथेटिक सामग्री की परिभाषा और पहचान
कानूनी परिभाषा: पहली बार 'सिंथेटिक रूप से उत्पन्न जानकारी' (एसजीआई) को औपचारिक रूप से परिभाषित किया गया है। इसमें ऐसी ऑडियो, विजुअल या ऑडियो-विजुअल सामग्री शामिल है जो एल्गोरिदम या एआई के जरिए बनाई या बदली गई हों, और जो वास्तविक व्यक्तियों या घटनाओं के जैसी दिखाई देती हों। यानी डीपफेक एडिटेड या डिजिटली एडिटेड तस्वीरें या वीडियो।
हालांकि, सामान्य संपादन (रूटिन एडिटिंग), सुलभता उपकरण (जैसे नेत्रहीनों के लिए टेक्स्ट-टू-स्पीच), शैक्षणिक सामग्री और सद्भावपूर्ण तकनीकी सुधारों को इन नियमों से बाहर रखा गया है, शर्त ये है कि वे सामग्री के अर्थ को न बदलें।
यूजर्स के लिए कैसे तय की गई नई जिम्मेदारियां?
नए संशोधन के तहत डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करने वाले यूजर्स के लिए कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां और जवाबदेही तय की गई हैं, जो मुख्य रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सिंथेटिक सामग्री को लेकर लागू होंगी।
अनिवार्य घोषणा (यूजर डिक्लेरेशन): सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए अब यह जरूरी है कि वे यूजर्स से यह घोषणा लें कि उनके द्वारा अपलोड की गई सामग्री एआई से तैयार की गई है या नहीं। जब यूजर किसी बड़े प्लेटफॉर्म पर कंटेंट अपलोड करेंगे, तो इसकी खुद घोषणा करनी होगी कि क्या इसे बनाने में एआई का उपयोग किया गया है।
ईमानदारी की जरूरत: नई नियमावली के अनुसार, कंटेंट की प्रकृति के बारे में सच बोलने की जिम्मेदारी अब सीधे यूजर पर है। हालांकि, प्लेटफॉर्म्स इन घोषणाओं की सटीकता की जांच के लिए अपने तकनीकी उपकरणों का उपयोग करेंगे, लेकिन प्राथमिक जिम्मेदारी यूजर की होगी।
लेबल और मेटाडाटा के साथ छेड़छाड़ पर रोक: यूजर्स को उन लेबल या स्थायी मेटाडाटा (provenance markers) को हटाने, दबाने या उनके साथ छेड़छाड़ करने से स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है, जो प्लेटफॉर्म की तरफ से एआई की पहचान के लिए लगाए जाते हैं।
कानूनी कार्रवाई को लेकर जागरूकता: प्लेटफॉर्म्स को अब हर तीन महीने में कम से कम एक बार यूजर्स को यह चेतावनी देनी होगी कि नियमों का उल्लंघन करने या एआई का गलत इस्तेमाल करने पर उन्हें सजा भुगतनी पड़ सकती है। इसमें अकाउंट का निलंबन, सामग्री को हटाया जाना और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), बाल संरक्षण (पॉक्सो) और चुनाव कानूनों के तहत आपराधिक कार्रवाई हो सकती है।
पहचान का खुलासा: अगर एआई के जरिए कोई अवैध कार्य या अपराध किया जाता है, तो नियमों के तहत प्लेटफॉर्म पीड़ितों या कानून प्रवर्तन एजेंसियों को यूजर की पहचान बताने के लिए बाध्य हो सकते हैं।
स्पष्ट लेबलिंग: सिंथेटिक सामग्री बनाने या प्रसारित करने वाले प्लेटफॉर्म्स के लिए अब इसे प्रमुखता से लेबल करना जरूरी है। वीडियो में स्क्रीन पर स्पष्ट लेबल और ऑडियो में शुरुआत में डिस्क्लोजर देना होगा।
डिजिटल फिंगरप्रिंट: प्लेटफॉर्म्स को सामग्री में स्थायी मेटाडेटा या प्रोवेनेंस मार्कर (provenance markers) जोड़ने होंगे, जिससे यह पता लगाया जा सके कि सामग्री किस एआई टूल से बनाई गई है। इन लेबलों या मेटाडेटा को हटाना प्रतिबंधित है।