सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गूगल इंडिया जैसे मध्यस्थ कंपनियों के खिलाफ 2009 में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में संशोधन से पहले दर्ज मानहानि के अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, क्योंकि पहले के कानून ने इस तरह के दायित्व से कोई प्रतिरक्षा प्रदान नहीं की थी।
कोर्ट ने यह आदेश गूगल इंडिया की याचिका पर दिया, जिसमें आईटी एक्ट में संशोधन से पहले मानहानि का मामला रद्द करने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि मानहानि की शिकायत 2009 से पहले की थी और पहले के प्रावधानों के मुताबिक गूगल इंडिया को इससे राहत नहीं मिल सकता।
जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ ने कहा कि यह परीक्षण का विषय है कि क्या गूगल एलएलसी (मूल कंपनी) या गूगल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड वास्तविक मध्यस्थ थे, जिन्होंने सीमेंट की चादरें (एजबेस्टस शीट) बनाने वाली कंपनी की कथित आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित की थी।
संशोधन से पहले आईटी एक्ट की धारा 79 किसी भी मध्यस्थ को आईपीसी की धारा 499/500 के तहत अपराध से सुरक्षा नहीं देती।