सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को महात्मा गांधी की हत्या की दोबारा जांच करवाने की याचिका खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस केस की दोबारा सुनवाई का अनुरोध अकादमिक शोध पर आधारित है लेकिन यह बरसों पहले घटी इस घटना की फिर से जांच का आधार नहीं बन सकता है। ऐसा करना व्यर्थ की कसरत साबित होगी।
जस्टिस एसए बोब्डे और एल नागेश्वर राव की पीठ ने मुंबई स्थित अभिनव भारत के पंकज फड़नीस की याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि अदालत भावनाओं के आधार पर फैसला नहीं करेगी। इस केस को दोबारा खोलने के लिए कानूनी सबूत चाहिए। फड़नीस ने अपनी याचिका में तीन बुलट के सिद्धांत पर सवाल उठाते हुए कहा था कि गांधी पर नाथूराम गोडसे के अलावा कोई और भी शामिल था, जिसने चौथी बुलेट चलाई थी।
इस पर पीठ ने कहा कि इस हत्या के छह चश्मदीद गवाह थे और सभी ने कहा था कि गोडसे ने ही गोली चलाई थी। यही नहीं, मेडिकल रिपोर्ट में तीन बुलेट लगने की बात कही गई है। एक गोली छाती के दाहिनी तरफ, दूसरी छाती के नीचे और तीसरी पेट के दाहिनी तरफ लगी थी।
इसके अलावा याचिका में गोडसे और आप्टे को शीर्ष अदालत के फैसले से पहले ही फांसी पर चढ़ाए जाने का सवाल उठाया था। फड़नीस के अनुसार गांधी की हत्या की जांच के लिए गठित कपूर समिति द्वारा विनायक दामोदर सावरकर के बारे की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों को हटाने का भी अनुरोध किया गया था क्योंकि इससे मराठाओं की भावनाओं को ठेस पहुंचती है।
इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि आप जिन दो लोगों की बात कर रहे हैं वे महाराष्ट्र के थे, लेकिन वे राज्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उनकी वजह से मराठाओं की छवि धूमिल नहीं हो रही है। मालूम हो कि नाथूराम गोडसे ने गांधी की 30 जनवरी, 1948 को गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में गोडसे के अलावा नारायण आप्टे को फांसी पर चढ़ा दिया गया था, जबकि सावरकर को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था।