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SC: 'दंगों में कोई प्रत्यक्षदर्शी दोषी न हो, यह सुनिश्चित करना जरूरी'; गोधरा कांड से जुड़े केस में शीर्ष कोर्ट

Fri, 21 Mar 2025 10:28 PM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

जस्टिस पी एस नरसिम्हा और मनोज मिश्रा की पीठ ने यह भी कहा  कि दंगों के मामलों में अदालतों को उन गवाहों की गवाही पर भरोसा करने में बेहद सावधानी बरतनी चाहिए, जिन्होंने अभियुक्तों या उनकी भूमिकाओं का विशेष संदर्भ दिए बिना सामान्य बयान दिए थे। यह टिप्पणी करते हुए शीर्ष अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया।
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उपासना स्थल कानून पर नई याचिकाओं से सुप्रीम कोर्ट नाराज - फोटो : ANI
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विस्तार
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गुजरात में गोधरा कांड के बाद भड़के दंगों से जुड़े एक मामले में शीर्ष कोर्ट ने छह लोगों को बरी कर दिया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष कोर्ट की जस्टिस पी एस नरसिम्हा और मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि दंगों के मामले में यह सुनिश्चित करना अदालतों का कर्तव्य है कि कोई भी प्रत्यक्षदर्शी दोषी न हो और उसकी स्वतंत्रता को छीन न जाए। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही यह बहुत कठिन है। 

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जस्टिस पी एस नरसिम्हा और मनोज मिश्रा की पीठ ने यह भी कहा  कि दंगों के मामलों में अदालतों को उन गवाहों की गवाही पर भरोसा करने में बेहद सावधानी बरतनी चाहिए जिन्होंने अभियुक्तों या उनकी भूमिकाओं का विशेष संदर्भ दिए बिना सामान्य बयान दिए थे। यह टिप्पणी करते हुए शीर्ष अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया। इस आदेश में हाईकोर्ट ने गुजरात के वडोद गांव में हुए दंगे के मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। साथ ही छह लोगों को दोषी ठहराया था जबकि 12 अन्य को बरी कर दिया।

शीर्ष अदालत ने कहा कि कई बार, जब अपराध सार्वजनिक रूप से होता है, तो उत्सुकतावश लोग घटना को देखने के लिए घरों से बाहर निकल आते हैं। ऐसे लोग केवल दर्शक होते हैं, हालांकि गवाहों को वे दंगाइयों का हिस्सा लग सकते हैं। ऐसे में जहां रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य ये साफ करते हों कि बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे, केवल उन लोगों को दोषी ठहराना सुरक्षित हो सकता है जिनके खिलाफ प्रत्यक्ष कृत्य का आरोप लगाया गया है।
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अदालत ने कहा कि वर्तमान मामले में अपीलकर्ता उसी गांव के निवासी थे जहां दंगे भड़के थे। ऐसे में घटनास्थल पर उनकी उपस्थिति स्वाभाविक है और यह अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष का यह मामला नहीं है कि वे हथियार या विध्वंसक उपकरण लेकर आए थे। इन परिस्थितियों में, घटनास्थल पर उनकी उपस्थिति एक निर्दोष दर्शक की तरह हो सकती है, जिसे निषेधाज्ञा के अभाव में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार था।

मामले में अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि 28 फरवरी, 2002 को गांव में दंगा भड़क गया था। जिसके चलते  सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हुआ और पुलिस वाहनों को नुकसान पहुंचा। बता दें कि, 27 फरवरी, 2002 को गुजरात के गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगने से 59 लोग मारे गए थे, जिसके बाद राज्य में दंगे भड़क गए थे।

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