1980 के बाद बर्फबारी में तेजी से आ रही गिरावट के पीछे जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार माना गया है। इसके कारण आने वाले समय में अत्यधिक आबादी वाले इलाकों में भारी जल संकट की आशंका जताई गई है। इससे पहले अध्ययनकर्ताओं के जमीनी अवलोकनों, उपग्रहों और जलवायु मॉडलों के वैज्ञानिक आंकड़े इस बात पर सहमत नहीं थे कि क्या ग्लोबल वार्मिंग लगातार भारी ऊंचाई वाले पहाड़ों में जमा होने वाले बर्फ को नष्ट कर रही है, लेकिन नए डार्टमाउथ अध्ययन इस बात को साबित करता है कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले 40 वर्षों में उत्तरी गोलार्ध के अधिकांश हिस्सों में मौसमी बर्फबारी वास्तव में काफी कम हो गई है। नेचर जर्नल में प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार इस नुकसान की सीमा और गति उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया के लाखों लोगों को संकट में डाल सकती है जो पानी के लिए बर्फ पर निर्भर हैं।
स्नोपैक में सबसे तेज कटौती
अध्ययन के अनुसार बर्फ के पिघलने से नदियों में बनने वाले पानी जिसे स्नोपैक कहते हैं, इसमें ग्लोबल वार्मिंग की वजह से सबसे तेज कटौती हो रही है। यह प्रति दशक 10 से 20 फीसदी के बीच दक्षिण-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी अमेरिका के साथ मध्य और पूर्वी यूरोप में हुई है। 21वीं सदी के अंत तक इस बात की आशंका है कि ये इलाके बर्फ विहीन हो जाएंगे। हम उस दौर से गुजरेंगे जहां पानी की भारी कमी होगी।
चार दशक में 169 नदी व घाटियों में आया बदलाव
अध्ययन में पता चला कि 1981 से 2020 तक उत्तरी गोलार्ध में 169 नदी-घाटियों में ग्लोबल वार्मिंग के चलते तेजी से बदलाव आया है। इस दौरान नदियों और झरनों में बर्फ का कम पिघला पानी देखा गया। सर्दियों के दौरान तापमान और बारिश में बदलाव के प्रति बर्फ बहुत संवेदनशील है और बर्फ के नुकसान से होने वाले जोखिम न्यू इंग्लैंड में दक्षिण-पश्चिम के समान नहीं हैं या आल्प्स के एक गांव के लिए ऊंचे पर्वतीय एशियाई क्षेत्र के समान नहीं हैं।
ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से बढ़ रहा तापमान
अध्ययन में कहा गया है कि बढ़ते औसत वैश्विक तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। पिछली सदी में मानवीय गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैसों के निकलने के कारण बढ़ते तापमान के कारण कई क्षेत्रों में औसत बर्फबारी और वैश्विक बर्फ आवरण में कमी आई है। बर्फ और बर्फ के आवरण में कमी से पारिस्थितिकी तंत्र बदल रहा है और हमारी जलवायु प्रणाली प्रभावित हो रही है।