देश के लिए यह बड़ी चेतावनी है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की पहल पर होने वाले ताजा अध्ययन से पता चला है कि गंगा और अलकनंदा नदी के पानी के स्रोत वाले सतोपंत और गोमुख (हिमालय) के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
इसका बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग है। इससे वैज्ञानिक चिंतित हैं। वैज्ञानिकों ने कहा है कि अगर यही हाल रहा तो अगले कुछ वर्षों में ग्लेशियर ही खत्म हो जाएंगे। इनसे नदियों को पानी नहीं मिल पाएगा। यदि ऐसा हुआ तो जल संकट और गहरा जाएगा।
ग्लेशियर पिघलने का रिसर्च प्रोजेक्ट पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने आईआईटी कानपुर को दिया है। पृथ्वी विज्ञान के प्रो. इंद्र शेखर सेन और प्रो. राजीव सिन्हा की देखरेख में रिसर्च स्कॉलर ने हरिद्वार से गोमुख तक पानी के नमूने जुटाकर अध्ययन किया है।
पानी के ये नमूने हर महीने लिए जाते हैं। 20 अप्रैल को ही रिसर्च स्कॉलर सोमिता की टीम पानी के नमूने लेकर आई है। आइसोटोप तकनीक के जरिए नदियों में बारिश, ग्राउंड वाटर और बर्फ से पिघले जल के स्तर की माप की गई।
नदियों में ग्लेशियर के पिघलने से कितना पानी आया इसकी जांच में पाया गया कि हरिद्वार से गोमुख तक नदियों (गंगा और अलकनंदा) के पानी में ग्लेशियर के जल की मात्रा 30 फीसदी है, जो सामान्य से काफी अधिक है।
ऐसे हुआ अध्ययन
गोमुख ग्लेशियर का पानी गंगा (भागीरथी) में आता है। गोमुख, गंगोत्री, हर्षशील, डाबरानी, उत्तरकाशी, देव प्रयाग और ऋषिकेश से पानी के नमूने लिए गए। अध्ययन के बाद ग्लेशियर के पिघलने की रिपोर्ट तैयार की गई। 2014, 2015 और 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक ग्लेशियर के पिघलने की गति काफी तेज है।
सतोपंत ग्लेशियर से अलकनंदा को पानी मिलता है। विष्णु प्रयाग, रुद्र प्रयाग, कर्ण प्रयाग, जोशी मठ, चमोली, कालेश्वर और रुद्र प्रयाग से पानी के नमूने लिए गए। अध्ययन में पता चला कि पानी में ग्लेशियर के जल की मात्रा काफी अधिक है। सामान्य तौर पर ग्लेशियर से नदी में 15 फीसदी पानी ही आता है।
नदियों में जल के स्रोत
ग्लेशियर, बर्फ, बरसात का पानी और ग्राउंड वाटर
खेती हो जाएगी चौपट
यदि नदियों में पानी की मात्रा कम हुई तो हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट प्रभावित होंगे। खेती चौपट हो जाएगी और कृषि करना काफी मुश्किल होगा। पेयजल का संकट भी खड़ा होगा।
अमेरिका ने भी दिया सहयोग
जलवायु परिवर्तन का नदियों और ग्लेशियर पर असर के अध्ययन का प्रोजेक्ट पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने आईआईटी कानपुर को दिया है। 18 लाख रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है। अमेरिका की फंडिंग एजेंसी ‘यूएस एड’ ने रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए 1 करोड़ रुपये की धनराशि दी है। यह प्रोजेक्ट चार साल (2014-2017) का है। यह रिसर्च 2017 में पूरी होगी, जिसकी रिपोर्ट पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को सौंप दी जाएगी।