प्रधानमंत्री से इतना सम्मान पाने के बाद बारी गुलाम नबी आजाद की थी। 41 साल की संसदीय राजनीति के घुटे हुए नेता ने उसी स्तर को बनाए रखा। गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस पार्टी की परंपरा, नेताओं की सोच, विपक्ष के नेताओं के संवाद, राजनीतिक संबंध को बहुत सुंदर तरीके से बयान किया।
बताया कि जीवन में सिर्फ पांच बार रोए
गुलाम नबी आजाद ने यह भी बताया कि वह अपने जीवन में केवल पांच बार रोए। संजय गांधी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी की मौत पर, चौथी बार 1999 में उड़ीसा में सुनामी के दौरान लाशों को देखकर और पांचवी बार जब वह यूपीए-1 सरकार के समय जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे तब। उस आतंकी घटना पर उनकी आंखों में आंसू थे, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में किया था।
गुलाम नबी आजाद ने याद करते हुए बताया कि कैसे इंदिरा गांधी कहा करती थी कि वे तत्कालीन भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी के संपर्क में रहा करें। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कैसे उन्हें दूसरी बार विपक्ष के नेताओं का ख्याल रखने के लिए भी कहा था। इतना ही नहीं 1991-96 के दौरान पीवी नरसिंह राव की अल्पमत वाली सरकार में संसदीय कार्य मंत्री थे तो तत्कालीन विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के साथ किस तरह का तारतम्य था।
आजाद अपने वक्तव्य को दो कदम और आगे ले गए। उन्होंने कहा कि उन्होंने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष से लेकर संसदीय राजनीति में विपक्ष के खेमे में बैठकर हमेशा अपने साथियों से विपक्षी दल होने के नाते दो दिन सरकार के साथ मुद्दों पर तल्खी के और अगले दिन उदारवादी कामकाजी सोच के साथ आगे बढ़ने की परंपरा पर चलने की सीख दी। गुलाम नबी अंत में फिर प्रधानमंत्री की तरफ लौटे।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उदारवादी सोच की बढ़ाई की। गुलाम नबी ने कहा कि कभी प्रधानमंत्री ईद, दीपावली, जन्मदिन के समय फोन करने से नहीं चूकते थे। गुलाम नबी ने कहा कि ऐसे समय में हमेशा उनके पास दो फोन जरूर आते थे। एक फोन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का होता था और दूसरा फोन प्रधानमंत्री मोदी का जरूर होता रहा। गुलाम नबी ने कहा कि जब वह राज्यसभा का चुनाव लड़ रहे थे, तब भी प्रधानमंत्री का फोन आया, उन्होंने सहयोग, कुशल क्षेम भी पूछा। आजाद यह भी याद दिलाना नहीं भूले कि प्रधानमंत्री ने हमेशा उदारता दिखाते हुए किसी भी काम को नि:संकोच बताते रहने को कहा।
अपने विदाई भाषण में आजाद ने कई अच्छे शेर और पंक्तियों का सहारा लिया, लेकिन उनके आखिरी शेर ने पूरे सदन की तालियां बटोरी। वह कुछ इस तरह रहा-
नहीं आएगी याद, तो वर्षों नहीं आएगी।
मगर जब याद आओगे, तो बहुत याद आओगे।।