दक्षिण भारत के मंगलौर में एक ईसाई परिवार में पैदा हुए जॉर्ज फर्नांडिस मुंबई आए तो थे एक पादरी बनने, लेकिन किस्मत ने उन्हें भारत के उन चंद नेताओं में से एक बना दिया जिन्होंने जाति-धर्म और संप्रदाय को मीलों पीछे छोड़ दिया। मुंबई में एक पार्षद बनने से शुरु हुई उनकी राजनीतिक यात्रा नौ बार सांसद बनने के साथ ही केंद्रीय रक्षामंत्री बनने तक जारी रही।
1967 में राममनोहर लोहिया ने जॉर्ज फर्नांडिस को लोकसभा का चुनाव लड़ने की सलाह दी थी। इसके बाद उन्होंने राजनीति के दिग्गज एसके पाटिल के सामने चुनाव लड़ा और विजयी रहे। 1973 में वे एनआरएमयू के अध्यक्ष चुने गए।
इसके बाद वे रेलवे कर्मचारियों के बड़े संगठन ऑल इंडिया रेलवे फेडरेशन के अध्यक्ष चुने गए। इसके बाद जार्ज ने रेलवे के सभी छोटे-बड़े संगठन को मिलाकर एक कोआर्डिनेशन कमेटी बनाई। 8 मई 1974 को रेलवे के इतिहास में जो हड़ताल हुई उसकी आज तक मिसाल दी जाती है।
इंदिरा गांधी जैसे दिग्गज प्रधानमंत्री के रहते हुए उन्होंने 14 दिनों तक पूरे देश में रेलवे का पहिया ठप करा दिया था। माना जाता है कि उस समय रेलवे के तीन लाख से अधिक कर्मचारियों ने इस हड़ताल में भाग लिया था। उस समय सरकार ने जॉर्ज फर्नांडिस सहित सभी नेताओं को जेल में डाल दिया था।
रघु ठाकुर ने बताया कि आपातकाल की घोषणा के समय जॉर्ज फर्नांडिस उड़ीसा के गोपालपुर में थे। यहां उनकी ससुराल थी। वहीं से वे भूमिगत हो गए। इसके बाद ही उन्होंने बड़ौदा कांड की पटकथा लिखी थी। मुरारजी देसाई की सरकार हो या अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार, जॉर्ज फर्नांडिस ने अपने शानदार काम से एक इतिहास लिखा।
रक्षामंत्री रहते हुए सेना के जवानों के साथ बर्फीले इलाकों में सैनिकों की तकलीफ समझने के बाद ही उन्होंने रक्षासचिव को इन इलाकों का दौरा करने का आदेश जारी किया था। जिससे वे सैनिकों की समस्याएं समझ सकें। कोंकड़ रेलवे पूरी तरह से जॉर्ज फर्नांडिस का ही ब्रेन चाइल्ड कहा जाता है।