आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण का फैसला और सुप्रीम कोर्ट (1992 इंदिरा साहनी फैसला) की 50 फीसदी सीमा के बीच टकराव के आसार नहीं हैं। दरअसल, 50 फीसदी आरक्षण सीमा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरी के मामले में है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण का मामला पूरी तरह अलग है।
अभी क्या है आरक्षण की व्यवस्था
अभी सरकारी नौकरियों में फिलहाल 49.5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है। इससे अधिक आरक्षण के लिए सरकार को मौजूदा आरक्षण कानून में संशोधन करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसदी से अधिक आरक्षण पर रोक लगाई है। कैबिनेट के सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने के फैसले से पहले अनुसूचित जाति (एससी) को 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति (एसटी) को 7.5 फीसदी और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है।
अनुच्छेद 15 और 16
आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को आरक्षण के दायरे में लाने के लिए केंद्र सरकार को संविधान के अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में संशोधन करना होगा। आइए देखते हैं कि इन अनुच्छेदों में आरक्षण संबंधी प्रावधान क्या हैं। इन्हीं के आधार पर कहा जा सकता है कि सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण का फैसला लागू किया जा सकता है। खास तौर पर अनुच्छेद 15 (4) इसे लागू कराने का आधार बन सकता है।
अनुच्छेद 15- सामाजिक समता का अधिकार दिया गया है जिसके अनुच्छेद 15(4) में आरक्षण संबधी प्रावधान है।
अनुच्छेद 15 (4) - इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29 के खण्ड (2) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।
अनुच्छेद 16- समता के अधिकार के अंतर्गत आता है। अनुच्छेद 16 लोक नियोजन के अवसर की समता की बात करता है।
अनुच्छेद 16(4) - राज्य पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग को जिसका सरकारी सेवाओं पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीँ है, पदों के आरक्षण के लिए व्यवस्था कर सकता है।
(मण्डल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ऐसी व्यवस्था की जा चुकी है।)
अनुच्छेद 16(5) -किसी धार्मिक या साम्प्रदायिक संस्था के कार्य से सम्बंधित कोई पद उस विशिष्ट धर्म या विशिष्ट सम्प्रदाय के व्यक्ति के लिए आरक्षित किया जा सकता है, जिससे वह संस्था संबद्ध है।
तमिलनाडु में 68 फीसदी आरक्षण
दिलचस्प है कि तमिलनाडु में 68 फीसदी आरक्षण लागू है। राज्य सरकार ने इस 68 फीसदी आरक्षण के कानून को संविधान की नौंवी अनुसूची में डाला हुआ है। नौंवी अनुसूची में डाले गए कानूनों की न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2008 में एक फैसला देकर कहा था कि नौंवी अनुसूची में डाले गए कानूनों की समीक्षा अदालत कर सकती है।
कई नेता कर चुके हैं वकालत
पिछले दिनों भाजपा के थिंक टैंक और आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने सवर्णों को आरक्षण देने की वकालत की थी। इसके अलावा भाजपा सांसद एवं दलित नेता उदित राज ने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के सरकार के फैसले का स्वागत किया है। बसपा सुप्रीमो मायावती भी इस तरह की मांग रख चुकी हैं। इससे पहले भी कई राजनेता गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात कहते रहे हैं। रामदास अठावले भी गरीबों को आरक्षण की वकालत करते रहे हैं और उन्होंने इस फैसले का स्वागत किया है।