स्कूल बहुत दूर है, हमें पैदल चलकर जाना पड़ता है। हमारे स्कूल में शौचालय तो है, मगर उसमें पानी नहीं है। सरकारी दवा केंद्र पर सभी दवाएं नहीं मिलती, बाजार से लेनी पड़ती हैं। हम ईंट-भट्ठों पर रहते हैं, हमारे साथ अच्छा बर्ताव नहीं होता। हमसे काम कराया जाता है। मिड डे मील की क्वालिटी अच्छी नहीं है। खाने में दूध-अंडा भी शामिल हो। जिन्हें यह पसंद न हो, उन्हें केला दे दें। और हां, सरकार को पौष्टिक मिड डे मील 12 वीं कक्षा तक उपलब्ध कराना चाहिए। ये सब बातें देश के बच्चों ने राजनीतिक दलों से कही हैं। इनका कहना है कि हमारी इन मांगों को राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र में शामिल करें।
बता दें कि देश में 40 फीसदी जनसंख्या 18 साल से कम आयु वाले बच्चों की है। ऐसे बच्चे करीब 47.2 करोड़ हैं। बच्चों की समस्याओं और उनके निदान पर काम कर रहे गैर-सरकारी संगठन 'चाइल्ड राइट एंड यू' ने लोकसभा चुनाव से पहले बच्चों से बातचीत कर एक रिपोर्ट तैयार की है। यह रिपोर्ट विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सौंपी गई है।
संगठन की प्रमुख पूजा मारवाह का कहना है, नवंबर-दिसंबर 2018 में 7-18 वर्ष की आयु के एक हजार से ज्यादा बच्चों के साथ बातचीत की गई थी। छह वर्ष से कम आयु वाले बच्चों के अभिभावकों को चर्चा में शामिल किया गया है।
14 राज्य, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, दिल्ली और हरियाणा में ग्राउंड लेवल पैनल (जीएलपी) बनाकर बच्चों से बातचीत की गई।
करीब 70 पैनलिस्ट की मदद से कई सामान्य तरीकों के जरिए बच्चों से सवाल पूछे गए। जीएलपी के तहत दो दिवसीय वर्कशॉप आयोजित कर बच्चों के मन की बात जानने का प्रयास किया गया। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने भरोसा दिलाया है कि वे बच्चों की इन मांगों को लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में शामिल करेंगे।