मुंबई सहित महाराष्ट्र और देशभर में सोमवार से बप्पा मोरिया की धूम शुरू हो जाएगी। मुंबई के कुछ गणेशोत्सव मंडलों में भारी भीड़ उमड़ेगी तो कुछ अपने अतीत को समेटे श्रद्धाभक्ति से सराबोर रहेंगे। साल 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने मुंबई में जिस सार्वजनिक गणेशोत्सव का पौधारोपण किया था। वह वट बृक्ष तो बन गया लेकिन तिलक की गणपति अपनी पहचान का मोहताज बन गया। वजह ये है कि तिलक का गणेशोत्सव मंडल मौजूदा समय में भी परंपरागत तरीके से गणेशोत्सव मनाता है। यहां न आधुनिक चकाचौंध रहेगी न सेलिब्रिटी की धूम और न ही ग्लैमर का कोई तड़का।
मुंबई में गिरगांव के खाडिलकर रोड पर केशवजी नायक चाल में तिलक ने गणेशोत्सव की शुरुआत की थी। आगामी चार सितंबर से यहां 124 वें साल फिर से बप्पा बिराजेंगे। वैसे तो यहां गणेशोत्सव की परंपरा 1893 से बदस्तूर जारी है। लेकिन, गणेशोत्सव के दौरान यहां उस तरह की भीड़ नहीं होती जिस तरह से मुंबई के लालबाग के राजा और पुणे के दगड़ू सेठ हलवाई के गणपति के दर्शन के लिए लोग उमड़ते हैं। मुंबई के किसी अन्य गणेशोत्सव मंडल के मुकाबले यहां न सेलिब्रिटी आते हैं और न ही इसका इतना ज्यादा प्रचार-प्रसार ही होता है।
इस गणेशोत्सव मंडल के चेयरमैन भालचंद्र घरत हैं जबकि कुमार वालेकर कोषाध्यक्ष। कुमार बताते हैं कि केशवजी नायक चाल में कुल छह इमारतें हैं जिसमें 150 से ज्यादा फ्लैट हैं और करीब 600 लोग रहते हैं। चाल में ही आर्किटेक्ट, डिजाईनर भी हैं जो गणेशोत्सव पांडाल को सजाते हैं। सिर्फ गणेश की प्रतिमा ठाकुर द्वार के जीतेकर वाड़ी से लाई जाती है। वह कहते हैं कि हम परंपरागत तौर पर पूरे धार्मिक विधिविधान के साथ गणेशोत्सव मनाते हैं। इसलिए ग्लैमर की चिंता नहीं करते। परंतु, अगले साल सवा सौ साल पूरे होने पर जरूर इसके बारे में सोचेंगे।
मोरे परिवार की पांचवी पीढ़ी बनाती है गणेश की मूर्ति
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तिलक द्वारा स्थापित श्री सार्वजनिक गणेशोत्सव संस्था के गणपति की पहली मूर्ति स्व. गणपतभाऊ मोरे ने बनाई थी। अब उनकी पांचवी पीढ़ी के राजेश मोरे और जयेश मोरे इस संस्था के लिए गणेश की प्रतिमा बनाते हैं। जयेश मोरे ने बताया कि यहां आदमदक नहीं बल्कि तिलक द्वारा स्थापित दो फुट के गणपति ही बैठाए जाते हैं इसलिए उसी आकार में मिट्टी की गणेश की मूर्ति गढ़ी जाती है। मूर्ति के लिए मिट्टी गुजरात के भावनगर से लाई जाती है।
पालकी में आते हैं गणपति
तिलक के गणेशोत्सव में आज भी पालकी में गणेश की मूर्ति लाई जाती है और विसर्जन भी उसी पालकी में सजाकर की जाती है। मराठों की परंपरागत पोशाक, ढोल ताशे और लेजिम की ताल पर ही भगवान गणेश की मूर्ति का विसर्जन भी किया जाता है। कुमार वालेकर बताते हैं कि यह पालकी 1964 में बनवाई गई थी जबकि संस्था का पंजीयन 1939 में हुआ था।
अब आजादी के नहीं गूंजते हैं देशभक्ति के तराने
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लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव को आजादी की लड़ाई, छुआछूत को दूर करने, समाज को संगठित करने का जरिया बनाया था। रोलेट समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि गणेशोत्सव में युवकों की टोलियां सड़कों पर घूम-घूमकर अंग्रेजी शासन के विरोध में गीत गाती है और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मराठों से शिवाजी की तरह विद्रोह करने का आह्वान होता है। लेकिन, आजादी के बाद अब इसका स्वरूप बदल गया है।
अब आजादी के नहीं देशभक्ति के गीत गाए जाते हैं। 10 दिन तक चलने वाले गणेशोत्सव के दौरान संगीत प्रतियोगिता, युवाओं और महिलाओं के लिए कार्यक्रम के साथ ही बच्चों के बौद्धिक विकास की प्रतियोगिता भी होती है।