एफएसएसएआई के सीईओ अग्रवाल के मुताबिक हम शरीर में पोषक तत्वों की कमी पूरी करने के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, तो वह फूड सप्लीमेंट लेने की सलाह देता है। लेकिन ये सप्लीमेंट काफी महंगे होते हैं और हर कोई इन्हें वहन नहीं कर सकता। इसलिए यह आसान तरीका है कि जरूरी खाने-पीने की वस्तुओं के जरिए पोषक तत्वों की कमी को पूरा किया जाए। उन्होंने बताया कि फिलहाल केवल दूध, खाद्य तेल, चावल, आटा और नमक से इसकी शुरूआत की गई है।
नहीं होगा ओवरडोज
उन्होंने इस बात से इंकार किया कि सूक्ष्म पोषक तत्वों की अधिक मात्रा से ओवरडोज की समस्या होगी। उन्होंने कहा कि स्टैंडर्ड के हिसाब से रोजाना की जरूरत का 30 से 50 फीसदी ही सूक्ष्म पोषक तत्व की खुराक देने की मात्रा तय की गई है। दूध और खाद्य तेल में विटामिन ए के लिए खुराक की मात्रा माइक्रोग्राम रेटीनॉल, विटामिन डी के लिए माइक्रोग्राम निर्धारित है। जबकि आटे और चावल में आयरन को दूसरे स्रोतों के जरिए शामिल किया गया है।
भारत में अनिवार्य नहीं फोर्टिफिकेशन
अग्रवाल के मुताबिक दुनिया के तकरीबन 186 देशों में फूड फोर्टिफिकेशन अनिवार्य रूप से लागू है। जबकि भारत में यह स्वैच्छिक है और फूड फोर्टिफिकेशन के लिए किसी कंपनी पर दबाव नहीं डाला गया है। उन्होंने बताया कि सरकार जल्द ही खाद्य तेलों में फूड फोर्टिफिकेशन को अनिवार्य रूप से लागू करने की योजना बना रही है, लेकिन इसे लागू होने में सालभर का वक्त लग सकता है।
बढ़ी बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता
उन्होंने उत्तर भारत में हुई एक हालिया रिसर्च का हवाला देते हुए कहा कि जब बच्चों को लगातार फोर्टिफाइड दूध दिया गया तो उन्हें दस्त या डायरिया में 18 फीसदी की कमी आई, जबकि न्यूमेनिया में 26 फीसदी, बुखार में 7 फीसदी और वे 15 फीसदी कम गंभीर रूप से बीमार हुए।
वहीं खाद्य वस्तुओं में सिंथेटिक विटामिन मिलाने के आरोपों पर अग्रवाल ने कहा कि वे जनता के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। विटामिन सिंथेटिक है या नेचुरल इससे एफएसएसएआई को कोई फर्क नहीं पड़ता, उनकी जवाबदेही आम जनता को सुरक्षित एवं मिलावट रहित भोजन उपलब्ध कराना है।
सांइटिफिक पैनल में जाने-माने विशेषज्ञ
अग्रवाल के मुताबिक एफएसएसएआई केवल फूड इंडस्ट्री में तय मानकों को लागू करती है, ना कि मानक बनाती है। उन्होंने बताया कि न्यूट्रिशियन और फोर्टिफिकेशन पर सांइटिफिक पैनल की रिपोर्ट की बाद ही यह मानक तय किए गए। इस पैनल में एम्स, मेदांता, नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट, सीएसआईआर समेत कई रिसर्च संस्थानों के जाने-माने विशेषज्ञ शामिल हैं।
भारत में एनिमिया गंभीर समस्या
उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 में यह तथ्य सामने आया था कि 6 से 59 महीनों के 58.4 प्रतिशत बच्चे एनिमिक यानी रक्तहीनता से पीड़ित हैं, जबकि 5 साल से कम आयु के 35.7 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले हैं। वहीं 15 से 49 उम्र वाली 53 फीसदी महिलाएं प्रजनन की आयु में एनिमिया की शिकार हैं। जबकि 15 से 49 उम्र वाले 22.7 फीसदी पुरूष भी एनिमिया से पीड़ित हैं।
इससे पहले बीते सोमवार को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने आरोप लगाया था कि फूड फोर्टिफिकेशन से बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा पहुंचेगा, जबकि देश का लघु एवं मध्यम उद्योग उनके सामने नहीं टिक पाएगा। फोर्टिफिकेशन के नाम पर आटा, चावल, दूध, नमक और खाद्य तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होगी। संसाधनों की कमी के चलते छोटी कंपनियों का व्यापार चौपट हो जाएगा।