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नया नहीं जासूसी का जिन्न, 26/11 से बदस्तूर जारी है नजर रखने का काम

Mon, 31 Dec 2018 02:13 PM IST
पूजा मेहरोत्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला
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कंप्यूटर और फोन पर सरकार की नजर
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मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद से ही  सरकार लगातार कंप्यूटर और फोन पर नजर रखती आ रही है। पिछले दिनों सरकार के 10 एजेंसियों को दिए जा रहे इंटरसेप्ट के नोटिफिकेशन के बाद से ही राजनीतिक माहौल गर्म है। बता दें कि  कंप्यूटर और फोन पर सरकार के नजर रखने की बात नई नहीं है। एक आरटीआई में खुलासा हुआ है कि यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान केंद्र सरकार ने 7500 से 9000 फोन कॉल्स पर नजर रखने के आदेश जारी किए थे। इसके अलावा सरकार ने 500 ईमेल्स की भी निगरानी की जाती थी। और सरकार मुंबई हमले के बाद से ही 10 एजेंसियों को इंटरसेप्शन के अधिकार देते आ रहे हैं।
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20 दिसंबर को छिड़ गया विवाद, सरकार की यह है सफाई

कंप्यूटर पर निगरानी रखे जाने के बाद से केंद्र की मोदी सरकार पर विपक्ष चौतरफा हमलावर है। लगातार हो रहे हमलों के बीच गृह मंत्रालय ने कहा है कि केंद्र सरकार ने किसी कंप्यूटर से जानकारी निकालने के लिए किसी भी एजेंसी को पूर्ण शक्ति नहीं दी गई है। यही नहीं गृह मंत्रालय ने यह भी कहा कि कंप्यूटर इंटरसेप्ट करना कोई नया कानून, कोई नया नियम, कोई नई प्रक्रिया, कोई नई एजेंसी, कोई पूर्ण शक्ति और कोई पूर्ण अधिकार जैसा कुछ नहीं है। यह पुराना कानून, पुराना नियम, पुरानी प्रक्रिया और पुरानी एजेंसिया हैं।  

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 20 दिसंबर को एक नोटिफिकेशन जारी किया जिसके बाद राजनीतिक भूचाल ला दिया है। इस नोटिफिकेशन में कहा गया है कि देश की 10 एजेंसियां किसी भी नागरिक के कम्प्यूटर से जनरेट हो रही, भेजी, मंगाई जा रही और उसमें रखी गई सूचनाओं को रोक सकती हैं। वे न केवल इसकी निगरानी कर सकती हैं बल्कि इसे पढ़ भी सकती हैं। ये एजेंसियां इंटेलिजेंस ब्यूरो, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट, सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज, डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन, नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी, डायरेक्टरेट ऑफ सिग्नल इंटेलिजेंस, कैबिनेट सेक्रेटरिएट(रॉ) और दिल्ली पुलिस कमिश्नर हैं।
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मना किया तो सात साल की होगी सजा

सरकार द्वारा जारी इस नोटिफिकेशन में कहा गया है कि हर सब्सक्राइबर, सर्विस प्रोवाइडर या कम्प्यूटर रिसोर्स का मालिक इन एजेंसियों को सूचनाएं खंगालने का अधिकार देने के लिए बाध्य होगा। अगर कोई इससे इनकार करता है तो उसे सात साल तक की कैद हो सकती है। विपक्ष को डर सता रहा है कि सरकार इस निगरानी को उनके खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकती है। हालांकि कुछ जाने-माने आईटी और रक्षा विशेषज्ञ इस पर चिंता जाहिर कर रहे हैं। 

2011 का दिया गया हवाला

गृहमंत्रालय ने इसपर यह कह मामले को और गंभीर कर दिया है कि इस नोटिफिकेशन में कुछ भी नया नहीं है। यह 2011 से चल रहा है। 
देश की 10 एजेंसियों को किसी भी कम्प्यूटर का डेटा खंगालने का हक देने वाले केंद्र सरकार के आदेश का विरोध हो रहा है। 
जब मामले पर विरोध बढ़ा तो सरकार ने कहा कि कम्प्यूटर डेटा को हासिल करके जानकारी लेने और इसकी निगरानी करने के नियम 2009 में उस समय बनाए गए थे जब कांग्रेस नीत संप्रग सत्ता में थी और उसके नये आदेश में केवल उन एजेंसियों का नाम बताया है जो इस तरह का कदम उठा सकती हैं।

ट्वीट विवाद चल रहा है
इनदिनों संसद में शीतकालीन सत्र चल रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल आदेश को वापस लेने का दबाव बना रहे हैं। इसी मांग को लेकर इन्होंने शुक्रवार 21 दिसंबर को संसद में जमकर हंगामा भी किया। चूंकि इनदिनों जुबानी जंग के बीच ट्विटर जंग भी खूब चल रहा है तो इस मामले में ट्वीट शुरू है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर मोदी को डरा हुआ शासक बताय है और कहा है- 'देश को पुलिस स्टेट में बदलने से कोई फायदा नहीं मिलेगा मोदी जी। यह 100 करोड़ लोगों के सामने साबित करता है कि आप कितने डरे हुए शासक हैं।
 

सरकार ने कहा आतंकी नेटवर्क को नाकाम करना है मकसद


लगातार विरोध झेल रही सरकार ने कहा कि कंप्यूटर पर नजर रखने से आतंकी नेटवर्क को नाकाम करने में मदद मिलेगी। हाल ही में नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी द्वारा इस्लामिक स्टेट के बड़े मॉड्यूल के भांडाफोड़ के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार के इस नोटिफिकेशन की जरूरत का अहसास भी दिलाया। उन्होंने सवाल किया कि क्या बिना निगरानी ऐसी कार्रवाई संभव है? 

आईटी जानकारों ने नोटिफिकेशन को लेकर ये चिंता जाहिर की है। इस पूरी प्रक्रिया को ऐसे समझा जा सकता है क्योंकि सरकार का कहना है कि उसने कुछ भी नया नहीं किया है। 

ये है प्रक्रिया

पहले: कंप्यूटर के डेटा पर निगरानी तो पहले भी रखी जा रही थी। या यूं कहें कि कंप्यूटर में मौजूद डेटा तक सरकार की पहुंच 2009 से है। यह अधिकार आईटी एक्ट-2000 की धारा-69(1) के तहत दिया गया है।  मूल कानून में स्पष्ट किया गया है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार के गृह सचिव एजेंसी को डेटा तक पहुंचने के अधिकार दे सकते हैं। लेकिन इसमें एक क्लॉज डाला गया है जिसमें यह कहा गया है कि ऐसा तभी किया जा सकता है जब वे देश की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, अन्य देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध से जुड़ा खतरा महसूस करते हों। 

इनदिनों:  साइबर लॉ विशेषज्ञ पवन दुग्गल बताते हैं कि यह इतना आसान नहीं है।  केंद्र और राज्य सरकार के गृह सचिव ऐसा करने के लिए जरूरत से जुड़े तर्कों का रिव्यू करते हैं। संतुष्ट होने पर ही वे एजेंसी को नियुक्त करते थे। इन्हें एजेंसी नियुक्त करने की वजह भी लिखित में बतानी होती थी। लेकिन अब 10 एजेंसियां पहले ही नियुक्त कर दी गई हैं जिससे लोगों में शक पैदा होना स्वभाविक है।  

अधिकार पर यह होगा असर 

आतंकी हमले और सरकार के खिलाफ बढ़ते असंतोष को देखने हुए साल 2000 में आईटी एक्ट आया था लेकिन तब इसके अधिकार सीमित थे। इसके तहत सिर्फ इंटरसेप्शन (सूचना को अवरुद्ध) किया जा सकता था। मगर 2008 के संशोधनों में इसमें मॉनिटरिंग तथा डिस्क्रिप्शन के अधिकार भी शामिल किए गए। इधर, टेलीग्राफ अधिनियम-1885 सरकार की इस ताकत को और बढ़ाता है, जिसके तहत सरकार फोन कॉल और संदेशों पर नजर रख सकती है। 

इनदिनों:  लेकिन अब सरकार ने एजेंसियों को सीधे अधिकार दे दिए हैं। अगर कोई ऑपरेटर अपने डेटा देने से मना करता है तो उसे सजा दिए जाने का भी प्रावधान कर दिया है। इसे टेलीग्राफ एक्ट के साथ जोड़कर देखें तो व्यक्तिगत डेटा तक सरकार की पहुंच पहले से अधिक हो गई है। एजेंसियों को सरकार द्वारा इतनी ताकत दिए जाने की वजह से ही इसे निजता के अधिकार के हनन की आशंका पर बवाल काटा जा रहा है। साथ ही आईटी एक्ट की धारा 69(1) की समीक्षा की मांग भी उठ रही है। 

 

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कब क्या बने कानून


सरकार जनता पर निगरानी पहले से ही रखती आ रही है। 1885 में ब्रिटिश राज में टेलीग्राफ एक्ट बनाया गया था। इस कानून में 2007 में बड़े बदलाव 2007 किए गए। 2007-08 में इंटरसेप्शन की प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक केंद्रीय मॉनिटरिंग सिस्टम बनाया गया इसके अधीन 21 प्रादेशिक सिस्टम भी काम कर रहे हैं।  2011 में सरकार ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर बनाया जो डेटा खंगालने की प्रक्रिया बताता है।  

सरकार द्वारा टेपिंग का मामला समय-समय पर आता रहा है। 1990 में तब बहुत हंगामा मचा था जब  वीपी सिंह सरकार पर विपक्षी नेताओं के फोन टेप करवाने का आरोप लगा  था। यह आरोप  पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने वीपी सिंह सरकार पर लगाया था। मामला कोर्ट तक पहुंचा था। तब यह पता चला कि देश में फोन टेपिंग की न कोई प्रक्रिया है न इसे रोक पाने के उपाय ही है। 

मामला लंबा चला था। 1996 में इस मामले पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिशानिर्देश जारी करते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर किसी का फोन टेप करने की जरूरत महसूस होती है तो केंद्र सरकार के गृह सचिव या राज्य सरकार के  अधिकारी इसके लिए आदेश दे सकते हैं। कोर्ट की यही गाइडलाइंस आगे चलकर टेलीग्राफ कानून का हिस्सा बनीं। 

असरः विदेशों से डेटा मांगना आसान 

साइबर लॉ और आईटी एक्सपर्ट का कहना है कि जब मामला कोर्ट में होता है तो सरकार के पास आतंकी नेटवर्क के भंडाफोड़ के बाद कोई सबूत नहीं रहता है। लेकिन इस कानून के बाद प्रक्रिया कानूनी दायरे में होती है और ये सबूत वैध माने जाते हैं। इसे कानूनी चुनौती नहीं दी जा सकती है। अब डाटा का दुरुपयोग नहीं किया जा सकेगा। 

लेकिन इस मामले में कई पेचीदिगियां भी हैं। बड़ा सवाल यह है कि ये केंद्रीय एजेंसियां जो डेटा जुटाएंगी उसे कौन देखेगा, क्या कोई जिम्मेदार कमेटी है? फिर इसे किस प्रोटोकॉल के तहत देखा जाएगा? इस डेटा को नष्ट कैसे करेंगे? अभी तक इस पर कई चीजें हैं जो सरकार को स्पष्ट करनी है। 

सुप्रीम कोर्ट ने निजता को 2017 में ही मौलिक अधिकार का दर्जा दिया

सरकार ने एजेंसियों की जानकारी की नोटिफिकेशन की जानकारी के बाद आईटी एक्ट-2000 में भी कुछ संशोधन को प्रकाशित किया जिसके बाद से विवाद और बढ़ गया है। इस नोटिफिकेशन के बाद यह तय हो गया कि सोशल मीडिया कंपनियां यह सुनिश्चित करेंगी कि भारत में किसी भी शख्स के कंटेंट को 'ट्रेस' किया जा सके।

बता दें कि सोशल मीडिया कंपनियां डिलीट किया हुआ डेटा 90 से 180 दिनों तक अपने सर्वर में सुरक्षित रखती हैं, लेकिन प्रस्ताव पास हुआ तो सरकारी एजेंसियां किसी खास डेटा को ज्यादा समय के लिए सर्वर पर सुरक्षित रखने का आग्रह कर सकती है। यानी इसके बाद से सरकार के पास अब और शक्तियां होंगी जो आतंकी घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी साबित करती है।  

केंद्र के इस आदेश के बाद से ही मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। जहां याचिकाकर्ताओं ने मंत्रालय और सरकार के इस आदेश को रद्द करने की मांग की है। कोर्ट और सरकार दोनों ही जानते हैं कि अगर एजेंसियों ने डेटा खंगालने का अपना दायरा बढ़ाया तो निजता के उल्लघंन के मामले बढ़ सकते हैं। 

 
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