करीब महीने भर पहले सड़क दुर्घटना में 25 वर्षीय बांग्लादेशी युवक कमरुज्जामन की जान पर बन आई। उसके बाएं पैर की हड्डियां तकरीबन चकनाचूर हो गईं और रीढ़ की हड्डी के नीचे का हिस्सा जवाब दे गया। ढाका स्थित अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों को उसे बचाने के लिए लगभग हाथ खड़े ही कर दिए थे। वजह थी उसका अति दुर्लभ ब्लड ग्रुप जो डॉक्टरों को पता ही नहीं था। बहुत पड़ताल के बाद ब्लड ग्रुप के बारे में पता चला तो डॉक्टरों के होश फाक्ता हो गए।
बहुत कोशिशों के बाद पता चला कि कमरुज्जामन को बचाने के लिए दुर्लभ 'बॉबे ब्लड ग्रुप' चाहिए। ब्लड ग्रुप तो पता चल गया लेकिन दुर्लभ खून मिलता कहां से, अब ये मुसीबत उनके सामने थी।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक ऑनलाइन और ऑफलाइन पड़ताल के बाद एक मुंबई बेस्ड एजीओ 'थिंक फाउंडेशन' चलाने वाले विनय सेट्टी का पता चला। कमरुज्जामन के सहकर्मी एसके तुहिनूर आलम ने तुरंत मुंबई का रुख किया और भारत में इस ब्लड ग्रुप के महज 400 लोगों में से उन 4 लोगों से संपर्क किया जिनका खून घायल मरीज की जान बचाएगा।
स्वपना सावंत, कृष्णानंद कोरी, मेहुल भेलेकर और प्रवीण शिंदे ने बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाला एक-एक यूनिट खून दान किया।