वह आगे कहते हैं कि कई बार ऐसा लगता है कि पूर्व नौकरशाह भी सत्ता व विपक्ष की भांति विभाजित हो जाते हैं। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। वे मुद्दे को देखें, न कि विपक्षी मानसिकता को। सरकार अच्छा कर रही है तो उसे भी लोगों को बताएं। चीन के मामले में सरकार ने अच्छा स्टैंड लिया था। अब ये भी तो नहीं है कि नौकरशाहों की हर बात ठीक होगी। सवाल तो उन पर खड़े हो सकते हैं। बतौर आजाद, आप कोविड को ही देख लें। सरकार ने 11 एम्पावर्ड ग्रुप बनाए थे। उनमें सचिव ही तो सारा कामकाज देख रहे थे। बाद में जब कोरोना की दूसरी लहर ने तबाही मचाई तो इन समूहों की सलाह, रणनीति और कामकाज पर सवाल उठ खड़े हुए।
दो ही बातों का ध्यान रखें। एक, मुद्दे के आधार पर सरकारी निर्णय का विरोध या समर्थन करें। दूसरा, अब अनुभव अवश्य लिखें। किसी भी नौकरशाह ने जो कुछ कमाया है, वह उसी सामाजिक दायरे में रह कर कमाया गया है। यहां कमाई से मतलब अनुभव है। अब उसे देश से छिपाया क्यों जा रहा है। आप खुल कर बोलें और लिखें। किसी राज्य में स्कूल नहीं है, अस्पताल नहीं हैं, शिक्षक या डॉक्टर नहीं हैं। नौकरशाह जानते हैं कि इसकी वजह क्या है। बजट भी मंजूर हुआ, लेकिन उसके बावजूद लोगों को सुविधाएं नहीं मिल सकी। ऐसे मसलों पर नौकरशाहों को बोलना चाहिए।
पूर्व कैबिनेट सचिव बीके चतुर्वेदी, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के पूर्व सचिव सत्यानंद मिश्रा और पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई ने पश्चिम बंगाल के चीफ सेक्रेटरी विवाद में कहा था, यह घटना एक बुरी मिसाल कायम करने वाली है। यह सिविल सर्वेंट्स को हतोत्साहित करेगी। पिल्लई नेपिल्लई ने कहा, 'आजाद भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार है कि रिटायर होने से एक दिन पहले एक सचिव स्तर के अधिकारी को केंद्र में तैनात किया जा रहा है। यह आदेश पूरी तरह से अनियमित है। ऐसा कहना कि सचिव स्तर के अधिकारी को सुबह 10 बजे (किसी दिन विशेष) तक दिल्ली को रिपोर्ट करना होगा, यह अनसुना है। सभी नौकरशाहों के लिए कार्यभार ग्रहण करने का वक्त आम तौर पर छह दिन और यात्रा के समय को मिलाकर होता है। इसी मामले में बीके चतुर्वेदी ने कहा, यह स्पष्ट है कि भारत सरकार का मानना था कि राज्य में बंदोपाध्याय का बने रहना अहम था। अन्यथा उन्हें सेवा विस्तार नहीं दिया जाता। सीएम ममता बनर्जी ने उनके रिटायर होने से पहले आवेदन किया था। यह कानून के शासन में सिविल सर्वेंट्स के भरोसे को खत्म करता है। इस मामले में पीएम को जिसने भी सलाह दी है, वह ठीक से नहीं दी गई।
पूर्व सचिव सत्यानंद मिश्रा ने इस मामले में कहा था, यह काफी परेशान करने वाला घटनाक्रम है। सिविल सेवा के युवा अधिकारी इससे हतोत्साहित होंगे। हमें यह समझना चाहिए कि सिविल सर्विस की कल्पना मुख्य रूप से राज्यों में सेवा देने के लिए की गई थी। जो इच्छुक हैं, वे ही केंद्र में आएं। अगर आप एक मिसाल कायम करते हैं कि आप जिससे नाराज हैं, उसे केंद्र में बुलाया जाएगा, तो नौकरशाह कैसे काम करेंगे। उन्होंने बंदोपाध्याय को केंद्र में बुलाए जाने के तरीके पर भी सवाल उठाया। बंदोपाध्याय को केंद्र के आपदा प्रबंधन एक्ट के नोटिस पर, मिश्रा ने कहा कि यह बचकाना है। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों एक नया आदेश जारी कर दिया है। इसमें लिखा था, इंटेलीजेंस या सुरक्षा संबंधित किसी संस्थान से रिटायर होने वाले सरकारी कर्मी कोई भी लेख या किताब अपनी मर्जी से प्रकाशित नहीं कर सकते हैं। इसे प्रकाशित करने के लिए उन्हें अपने संस्थान से पूर्व मंजूरी लेनी होगी, जहां से वे काम करके रिटायर हुए हैं। इससे जुड़ा नोटिफिकेशन मिनिस्ट्री ऑफ पब्लिक ग्रीवेंस एंड पेंशन के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग ने जारी किया था। एक फॉर्म 26 अंडरटेकिंग के रूप में कर्मी को देना होगा। इसमें यह लिखा है कि अगर रिटायरमेंट के बाद वह अंडरटेकिंग की शर्तों का उल्लंघन करते हैं तो उनकी पेंशन रोकी जा सकती है।