क्यूबा, इसे देश नहीं छोटा सा एक टापू कहिए। दुनिया में इस टापू की पहचान कभी और किसी के आगे न झुकने की है। क्यूबा को यह गर्वीली पहचान महान शख्सियत, दुनिया में समाजवाद की स्थापना केलिए निरंतर संघर्ष करने वाले फिलेद कास्त्रो ने दी। वही कास्त्रो जिसने दुनिया के छोटे-छोटे देशों को बताया कि स्वाभिमान के साथ जीना किसे कहते हैं। कैसे एक छोटा सा देश दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका से आधी सदी तक लोहा ले सकता है।
आधी सदी तक आर्थिक प्रतिबंध झेलने वाले देश को स्वास्थ्य, चिकित्सा, उद्योग और कृषि के क्षेत्र में नई ऊंचाईयां दिला कर जीवित रहते किवदंती बने। इसलिए मैं कहता हूं कि दुनिया में अब कोई दूसरा फिदेल कास्त्रो पैदा नहीं होगा।
यूं तो बतिस्ता की तानाशाह सरकार को साल 1959 में ही उखाड़ फेंकने के बाद से ही फिदेल भारत के शुभचिंतकों में शुमार रहे। गुट निरपेक्षता का सिद्घांत विकसित करने वाले अपने देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से उनकी निकटता जगजाहिर है। देश की पहली महिला पीएम इंदिरा गांधी को तो वह बहन मानते थे।
जहां तक मेरा सवाल है तो मेरा उनके साथ सामना बीती सदी के 80 के दशक में तब हुआ जब कास्त्रो साल 1983 के मार्च महीने में 7वें गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत आए। इसी सम्मेलन में मैंने जाना कि फिदेल विवाद का निपटारा किस खूबसुरती से करते हैं।
उद्घाटन समारोह में उस समय तनावपूर्ण वातावरण पैदा हो गया जब जॉर्डन को मिस्र से पहले बोलने का मौका दिए जाने से नाराज यासर अराफात ने स्वदेश कूच करने की तैयारी कर ली। इस फैसले से जाहिर तौर पर मैं हक्का बक्का था। मैंने इसकी सूचना इंदिराजी के साथ-साथ कास्त्रो को दी।