केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव (फाइल)
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केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने वन संरक्षण नियमों में संशोधन करते हुए 100 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि के डायवर्जन से जुड़ी हर परियोजना के लिए किसी नोडल अधिकारी की ओर से क्षेत्र निरीक्षण किए जाने की अनिवार्य शर्त को हटा दिया है। इस कदम के साथ, अब वन संरक्षक, मुख्य वन संरक्षक या क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक को ऐसी जांच करने की अनुमति दी गई है।
सत्यापन के अतिरिक्त एक क्षेत्र निरीक्षण अनिवार्य था
पहले, 40 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि से जुड़े हर प्रस्ताव के लिए संबंधित वन वृत्त के वन संरक्षक को संबंधित मंडल वन अधिकारी (डीएफओ) की ओ से किए गए सत्यापन के अतिरिक्त एक क्षेत्र निरीक्षण करना होता था।
क्यों बदलाव कर रही है सरकार?
इसी तरह, 100 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि से जुड़ी किसी परियोजना के लिए डीएफओ के सत्यापन के अलावा, नोडल अधिकारी की ओर से भी क्षेत्र निरीक्षण किया जाना जरूरी था। यह नोडल अधिकारी मुख्य वन संरक्षक या उससे ऊपर के पद का अधिकारी होता। इस कदम का उद्देश्य वन भूमि को विकास परियोजनाओं (जैसे खदान, सड़क) के लिए तेजी से डायवर्ट करना है।
केंद्र सरकार की पहले से मंजूरी जरूरी
वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 (जिसे पहले वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के नाम से जाना जाता था) के नियम 9 के उप-नियम (12) में किए गए इस बदलाव की अधिसूचना बुधवार को जारी की गई। नियम 9 उन वन भूमि डायवर्जन प्रस्तावों की प्रक्रिया से संबंधित है जिनके लिए केंद्र सरकार की पहले से मंजूरी जरूरी होती है।
वन विभाग के आला अधिकारियों को करना होगा निरीक्षण
संशोधन के बाद अब, नियम 9 का उप-नियम (12) कहता है कि संबंधित मंडल वन अधिकारी की ओर से मौके पर सत्यापित किए गए हर प्रस्ताव के अलावा, 40 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि से जुड़े हर प्रस्ताव के लिए संबंधित वन मंडल का प्रभार संभाल रहे वन संरक्षक, मुख्य वन संरक्षक या क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक की ओर से भी साथ-साथ क्षेत्र निरीक्षण किया जाएगा।