भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य और पार्टी को हर बार संकट से उबारने वाले लाल कृष्ण आडवाणी इन दिनों केवल सक्रीय राजनीति से ही दूर नहीं बल्कि मौन भी हैं। उनकी खामोशी की तस्दीक 16वीं लोकसभा के आंकड़े करते हैं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बगल में आगे की सीट पर बैठने वाले आडवाणी की सदन में उपस्थिति 92 फीसदी से ज्यादा है मगर बीते पांच साल में संसद में उन्होंने केवल 365 शब्द ही बोले हैं।
यूपीए-2 की सरकार में 2009 से 2014 की तुलना में वह मोदी सरकार के कार्यकाल में सदन में उनकी आवाज 99 फीसदी कम सुनाई दी है। 15वीं लोकसभा में जहां आडवाणी ने 42 बार बहसों और अन्य कार्यवाहियों में हिस्सा लिया था और 35,926 शब्द बोले थे। 2014-19 तक पार्टी के लौहपुरुष आडवाणी 296 दिन लोकसभा में मौजूद रहे और सिर्फ 5 बार चर्चा और कार्यवाही में हिस्सा लिया। इस दौरान वह 3 मिनट से भी कम बोले। आडवाणी की उपस्थिति का आंकड़ा कई मंत्रियों, आज की भाजपा के शीर्ष वक्ताओं और विपक्ष के नेताओं से कहीं अधिक हैं।
ऐसा नहीं कि कम बोलते हैं आडवाणी
तारीख थी 8 अगस्त 2012, संसद में असम में बढ़ती गैरकानूनी घुसपैठ और हो रही जातीय हिंसा पर शोर शराबा मचा था। विपक्ष की तरफ से बोलते हुए अडिग आडवाणी से तमाम अवरोधों के बावजूद जारी रखा और 4957 शब्दों का भाषण दिया। विपक्ष का प्रस्ताव भले ही ठुकरा दिया गया मगर तबतक आडवाणी अपना काम कर चुके थे।
लालकृष्ण आडवाणी के पास कहने को कितना कुछ है इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने अपनी आत्मकथा 'मेरा देश, मेरा जीवन' (माय कंट्री, माय लाइफ) लिखी तो अपने जीवन पर 1000 से अधिक पन्ने लिख डाले।