केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि रामसर सूची के तहत पांच और भारतीय स्थलों को अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता दी गई है, जिससे देश में ऐसे स्थलों की संख्या 54 हो गई है। इन पांच स्थलों में तमिलनाडु के तीन और मिजोरम और मध्य प्रदेश के एक-एक स्थल को अंतरराष्ट्रीय महत्व के आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता दी गई है।
मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि भारत स्वतंत्रता के 75 वें वर्ष पर देश के 75 आर्द्रभूमि के लिए रामसर टैग प्राप्त करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर जो योजनाएं बनाई हैं उससे भारत की आर्द्रभूमि का ध्यान में रखने में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। उन्होंने ट्वीट किया कि यह बताते हुए खुशी हो रही है कि पांच और भारतीय आर्द्रभूमियों को अंतरराष्ट्रीय महत्व के आर्द्रभूमि के रूप में रामसर की मान्यता मिली है।
उन्होंने बताया कि तमिलनाडु के करिकीली पक्षी अभयारण्य, पल्लीकरनई मार्श रिजर्व फॉरेस्ट और पिचवरम मैंग्रोव और मध्य प्रदेश में साख्य सागर और मिजोरम के पाला वेटलैंड ने इस प्रतिष्ठित सूची में जगह बनाई है।
गौरतलब है कि करिकिली पक्षी अभयारण्य तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले में स्थित है। ये जलकाग, एग्रेट्स, ग्रे हेरॉन, डार्टर, स्पूनबिल, ग्रे पेलिकन, व्हाइट इल्बिस और नाइट हेरॉन के लिए प्रसिद्ध है। वहीं, पल्लीकरनई मार्श रिजर्व फॉरेस्ट बंगाल की खाड़ी से सटे चेन्नई के अंतिम शेष प्राकृतिक आर्द्रभूमि में से एक है। इसके अलावा पिचवरम मैंग्रोव दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव वन है जो लगभग 1,100 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करता है। यह सैंडबार द्वारा बंगाल की खाड़ी से अलग होता है।
इसके अलावा साख्य सागर मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में माधव राष्ट्रीय उद्यान में स्थित है। इसमें दलदली मगरमच्छों की प्रचुर आबादी है। वहीं, पाला आर्द्रभूमि मिजोरम की सबसे बड़ी प्राकृतिक आर्द्रभूमि है और 1,850 हेक्टेयर में फैली हुई है।
गौरतलब है कि रामसर संधि आर्द्रभूमि के संरक्षण और बुद्धिमानी से उसके उपयोग से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संधि है। इसका नाम कैस्पियन सागर स्थित ईरानी शहर रामसर के नाम पर रखा गया है, जहां दो फरवरी, 1971 को संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे।