क्या सरकार की एक भी प्रतिक्रिया पॉजिटिव आई है
किसान आंदोलन को शुरू हुए सात महीने से ज्यादा वक्त बीत चुका है। इस बीच केंद्र सरकार के साथ बैठकों के कई दौर संपन्न हुए, लेकिन बात नहीं बन सकी। सरकार ने हर बैठक के बाद यही कहा कि तीनों कृषि कानून रद्द नहीं होंगे। केंद्र सरकार, किसानों के साथ बातचीत करने के लिए तैयार है। किसानों को उम्मीद थी कि पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा के हाथ खाली रहेंगे। असम को छोड़कर पार्टी को कुछ ज्यादा हासिल नहीं हुआ, लेकिन केंद्र सरकार और भाजपा अपनी जिद्द पर अड़िग रहे। किसानों की कोई मांग नहीं मानी गई। दिल्ली की सीमा पर आंदोलन चल रहा है। वहां मौजूद किसानों की संख्या कभी बढ़ जाती और कभी कम हो जाती है। आंदोलन से जुड़े दोनों नेताओं ने कहा, देखिये यह आंदोलन नाजुक दौर में पहुंच रहा है। हमारी सार्वजनिक टिप्पणी ठीक नहीं रहेगी। बिना नाम के ही लिखा जाए। पहली, बात सात आठ माह में क्या सरकार की तरफ से एक भी प्रतिक्रिया पॉजिटिव आई है। जी नहीं, आई। हर बार सरकार ने कहा, कानून किसी कीमत पर वापस नहीं होंगे। संशोधन के लिए कोई सुझाव है तो दें। जब इतना कुछ हो गया तो किसान संगठन आज भी आंदोलन पर ही जमे बैठे हैं। उन्हें अपनी रणनीति में बदलाव करना चाहिए था।
उत्तर प्रदेश और पंजाब में 'हलधर' बाजी पलट सकते हैं
गुरनाम सिंह चढ़ूनी की बात गलत नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब, आंदोलन का सबसे ज्यादा असर इन्हीं राज्यों में है। अगले साल के शुरू में यहां चुनाव हैं। अगर किसान खुद के प्लैटफार्म पर राजनीति में उतरते हैं और उनके हाथ कुछ खास नहीं आता है तो भी इतना तय है कि वे दोनों राज्यों में बाजी पलट देंगे। जो पार्टी खुद को बढ़त में मानकर चल रही हैं, उनका मकसद अधूरा रह जाएगा। आंदोलन का प्रमुख चेहरा बने राकेश टिकैत, डॉ दर्शन पाल व योगेंद्र यादव सहित कई दूसरे पदाधिकारी राजनीतिक पारी खेल चुके हैं। ये नेता जानते हैं कि आंदोलन को लंबा खींचना संभव नहीं है। अधिक समय तक यदि आमजन को प्रदर्शन से दिक्कत होती रही तो उनकी नजर में 'किसान' की छवि बदल जाएगी। आंदोलन के कई नियम टूटे भी हैं। खुद राकेश टिकैत के मंच पर अभय चौटाला, दीपेंद्र हुड्डा और जयंती चौधरी सरीखे नेता आ चुके हैं।
हरियाणा में जेल से रिहा होते ही ओमप्रकाश चौटाला ने कह दिया है कि वे किसानों के बीच पहुंचेंगे। दूसरा, किसान आंदोलन में शामिल संगठनों के बीच आपसी तालमेल का अभाव है। कई संगठन अब अपना राजनीतिक मंच तैयार करने की सलाह देने लगे हैं। गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने गलत नहीं कहा कि भाजपा यदि हार जाती है तो वह किसानों की मांग मान लेगी। पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य में सत्ता से दूर रहने के बाद भी भाजपा ने किसानों की मांगें मानने से इनकार कर दिया है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि किसान जिस पार्टी का समर्थन करें, वह सत्ता में आने के बाद किसानों की मांगों से दूर हट जाए। मतलब, किसानों को अपनी सियासत के बारे में सोचना होगा।
राजनीति के करीब हैं, मगर ठप्पा लगने से घबराते हैं
गुरनाम सिंह चढ़ूनी कहते हैं, किसानों ने सारी तरकीबें लगा ली हैं, पर नतीजा क्या रहा। केंद्र सरकार कोई एक भी मांग मानने के लिए तैयार नहीं हुई। अगर किसानों ने किसी दूसरे दल को समर्थन दे दिया और वह सत्ता में आ गया। उसने भी अगर तीनों कानूनों को वापस नहीं लिया तो क्या करेंगे। पंजाब, हरियाणा, यूपी और दूसरे चुनाव वाले राज्यों में लोगों को बताएं कि सरकार ने किसानों के साथ क्या किया है। समाज के ईमानदार लोग, किसान, मजदूर और छोटे व्यापारी वर्ग को मिलकर अपनी सरकार बनानी चाहिए। आंदोलन से जुड़े अनेक नेता इस बात को समझते हैं, लेकिन अमल में लाने से डरते हैं। मोर्चा के वरिष्ठ नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा, चढ़ूनी 'मिशन पंजाब' को लेकर बयान दे रहे हैं। यह उनका निजी बयान है। संयुक्त किसान मोर्चा कोई राजनीति नहीं करेगा। किसानों की लड़ाई कृषि कानूनों के खिलाफ है।
दूसरी तरफ, गुरुवार को संयुक्त किसान मोर्चे की समन्वय समिति ने कहा, यह आंदोलन अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की पहल पर तीनों किसान विरोधी कानून रद्द कराने, बिजली संशोधन बिल वापस कराने तथा एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी किसानों को दिलाने के लिए शुरू किया गया है। हमारा चुनाव लड़ने का कोई इरादा नहीं है। आगामी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड एवं अन्य राज्यों के चुनाव में भाजपा को 'वोट की चोट' देने का अभियान जारी रहेगा। अगर किसी संगठन को लगता है कि उसे चुनाव में उतरना चाहिए तो वह स्वतंत्र है। संयुक्त किसान मोर्चे के बैनर तले राजनीतिक गतिविधि नहीं होगी।