संयुक्त किसान मोर्चे के वरिष्ठ पदाधिकारी अविक साहा ने शनिवार सुबह 'किसान आंदोलन' की रणनीति पर अमर उजाला डॉट कॉम के साथ विस्तृत बातचीत की है। उन्होंने कहा, केंद्र सरकार और भाजपा, आंदोलन को शुरू होने के पहले ही दिन से इसे तोड़ने का प्रयास कर रही है। किसानों को बदनाम करने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने दिया। आंदोलन में शामिल किसान संगठनों में फूट डालने का प्रयास किया गया। एक सवाल के जवाब में साहा ने कहा, अगर संगठन के किसी पदाधिकारी की तरफ से कोई अलग बयान आता है, तो उससे विचलित न हों। कोई किसान नेता चुनाव लड़ने की बात कह देता है। यह एक संगठन का विचार है। किसान संगठनों से मिलकर 'संयुक्त किसान मोर्चा' बना है। सभी अंतिम निर्णय मोर्चे द्वारा ही लिए जाते हैं। टीकरी बॉर्डर, सिंघु बॉर्डर, शाहजहांपुर बॉर्डर और यूपी बॉर्डर पर चल रहा किसानों का आंदोलन 'संयुक्त किसान मोर्चे' के नेतृत्व में चल रहा है।
किसान आंदोलन अभी तक अराजनीतिक रहा है, आगे भी रहेगा। मोर्चे ने जिस तरह से पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में अपनी जिम्मेदारी निभाई थी, अब वैसे ही उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में निभाएगा। इन दोनों राज्यों में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव हैं। किसान मोर्चे के पदाधिकारी घर-घर जाकर लोगों को भाजपा की असलियत बताएंगे। पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए भी रणनीति तैयार हो रही है। अन्नदाता, चुनावी राज्यों में जाकर किसी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करेंगे। लोगों को केवल यह बताया जाएगा कि 'कौन' किसान विरोधी है। किसान संगठनों की दर्जनों टीमें बनाई जा रही हैं। अविक साहा कहते हैं, आज प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा यह समझ रही है कि वे किसान आंदोलन को पराजित कर देंगे तो यह उनकी गलतफहमी है।
किसान आंदोलन, भाजपा के अलावा देश के उन करोड़ों लोगों के लिए भी एक परीक्षा है, जो शरीर को जला देने वाली गर्मी, कड़ाके की ठंड और बरसात में अन्न उगाते हैं। देश की आबादी में साठ फीसदी वोटर किसान हैं। इसके बावजूद प्रधानमंत्री को यह लगता है कि वे अपने व्यक्तित्व से साठ फीसदी वोटरों के बड़े समूह को हरा सकते हैं। चलो, इस लड़ाई में यह भी मालूम हो जाएगा कि लोकतंत्र में जनता के लिए नेता होते हैं या नेता के लिए जनता होती है। किसानों के लिए ये एक राजनीतिक परीक्षा है, जिसे वे अराजनीतिक रहते हुए पास करेंगे। भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी को यह बता दिया जाएगा कि उन्होंने लोकतंत्र की गलत या स्वयं रचित थ्योरी पकड़ ली है। लोकतंत्र में सदैव 'जनता के लिए नेता' होता है। यूपी, पंजाब और उत्तराखंड के बाद जहां कहीं भी चुनाव होंगे, वहां किसान पहुंचेंगे। बरसात शुरू हो रही है, अब दिल्ली बॉर्डर पर भी बड़ी तादाद में किसान आना शुरू हो जाएंगे। हां, सरकार अगर अपनी जिद्द छोड़कर बात करती है तो किसान प्रतिनिधि बातचीत में शामिल होंगे।